
नई दिल्ली : सीपीए ऑस्ट्रेलिया के एशिया-प्रशांत लघु उद्योग सर्वेक्षण 2025/26 के अनुसार, भारतीय लघु उद्योगों ने वर्ष 2025 में सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। 2019 के बाद से यह इनका सबसे दमदार प्रदर्शन रहा है। हालांकि, खर्चों के बढ़ते बोझ ने भविष्य की राह में कुछ चुनौतियां ज़रूर पेश की हैं, लेकिन 2026 में विकास को लेकर इन कारोबारियों का हौसला बुलंद है। सर्वेक्षण के आंकड़े गवाही देते हैं कि बीते साल 80 प्रतिशत भारतीय लघु उद्योगों ने तरक्की की राह पकड़ी, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 63 प्रतिशत के औसत के मुकाबले काफी आगे है। भविष्य पर नजर डालें तो, 87 प्रतिशत कारोबारियों को 2026 में अपना व्यवसाय और बढ़ने की उम्मीद है, जबकि 84 प्रतिशत अर्थव्यवस्था की मजबूती को लेकर आश्वस्त हैं। अपने पड़ोसी देशों को पीछे छोड़ते हुए, भारत इस क्षेत्र के सबसे सकारात्मक लघु उद्योग बाजारों के रूप में उभरकर सामने आया है। वर्ष 2025 में मिली इस बड़ी कामयाबी के पीछे मुख्य रूप से बेहतर ग्राहक सेवा, कुशल प्रबंधन और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल का बड़ा हाथ रहा है। मजबूत आत्मविश्वास के बावजूद, खर्चों का बढ़ता बोझ विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। सर्वेक्षण के अनुसार, 42 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बढ़ती लागत को 2025 की सबसे बड़ी चुनौती माना, जिसमें कच्चे माल की कीमतों ने लगातार तीसरे साल कारोबार को सबसे ज्यादा चोट पहुँचाई है। सीपीए ऑस्ट्रेलिया के फ़ेलो (एफसीपीए) और भारत में सीपीए ऑस्ट्रेलिया के प्रवक्ता, श्री अनिकेत तलाटी, ने कहा कि भारतीय एमएसएमई ने मजबूत घरेलू मांग के सहारे विस्तार की स्पष्ट तैयारी और आत्मविश्वास दिखाया है। उन्होंने कहा, “व्यवस्थित और विकास को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों के साथ-साथ मुक्त व्यापार समझौतों के जरिए नए निर्यात बाजारों तक पहुंच बढ़ने से भारतीय एमएसएमई को आगे बढ़ने में मदद मिली है। शुल्कों के प्रभाव को कम करने में भी इन समझौतों की अहम भूमिका रही है। पिछले वर्ष भारतीय एमएसएमई ने मजबूत प्रदर्शन और आत्मविश्वास दिखाया, और 2026 में भी वे बड़े विस्तार की योजनाओं के साथ आगे बढ़ रहे हैं।” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कारोबारी माहौल अब पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। उन्होंने कहा, “मार्च के बाद से बढ़ी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों के कारोबारी माहौल को प्रभावित किया है। ऊर्जा और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।” श्री अनिकेत तलाटी ने अपनी बात रखते हुए कहा, ;इसके साथ ही, रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव निर्यात से होने वाले मुनाफे को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है। बेहतरीन गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी कीमतों वाले भारतीय उत्पाद आज भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। हाल ही में हुए नए मुक्त व्यापार समझौतों ने निर्यात की संभावनाओं को लेकर भरोसे को और भी पुख्ता किया है। कुल मिलाकर, मैं भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के भविष्य को लेकर काफी सकारात्मक हूँ। हालांकि, आने वाले समय में विकास और लाभ की रफ्तार बनाए रखने के लिए व्यवसायों को बेहतर योजना, लागत और जोखिम के प्रभावी प्रबंधन, तथा नवीकरणीय ऊर्जा और वैकल्पिक कच्चे माल में निवेश पर विशेष ध्यान देना होगा।
50 प्रतिशत से अधिक लघु उद्योगों ने दिए नए रोज़गार: भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग देश में रोजगार बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इस क्षेत्र को खास तौर पर युवा उद्यमियों की नई पीढ़ी से नई ऊर्जा मिल रही है, जो कारोबार के तरीके बदलने और विकास को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्ष 2025 में 52 प्रतिशत भारतीय लघु उद्योगों ने अपने यहाँ कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई। वहीं, 69 प्रतिशत उद्योग 2026 में नई भर्तियाँ करने की योजना बना रहे हैं। यह आंकड़ा कई अन्य एशियाई देशों की तुलना में काफी बेहतर है। सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि भारत के 56 प्रतिशत लघु उद्योग मालिकों की उम्र 40 वर्ष से कम है, जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र का औसत 38 प्रतिशत है। युवाओं की यह मजबूत भागीदारी भारत के लिए बड़ी ताकत बनकर उभर रही है। इससे डिजिटल तकनीक को अपनाने, नए विचारों पर काम करने और आधुनिक कारोबारी मॉडल विकसित करने की रफ्तार तेज हुई है। यही वजह है कि भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग आने वाले समय में स्थायी और लंबे समय तक विकास करने की मजबूत स्थिति में नजर आ रहे हैं।
डिजिटल भुगतान और ई-कॉमर्स की दौड़ में सबसे आगे : पूरे क्षेत्र में डिजिटल बदलाव की लहर बहुत तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2025 में 89 प्रतिशत भारतीय लघु उद्योगों ने अपनी कुल आय का 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा डिजिटल भुगतान माध्यमों से हासिल किया, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक है। इसके साथ ही, 74 प्रतिशत व्यवसायों ने अपनी कमाई का 10 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ई-कॉमर्स के जरिए अर्जित किया। सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि हर 10 में से 9 उद्योग अपने कारोबार से जुड़े कामों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारतीय लघु उद्योगों के दैनिक कामकाज में डिजिटल तकनीकों और ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग अब तेजी से सामान्य और जरूरी हिस्सा बन चुका है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में बढ़ा निवेश: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के क्षेत्र में भी भारतीय लघु उद्योगों का निवेश तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2025 में एआई में निवेश करने वाले भारतीय लघु उद्योगों का अनुपात 26 प्रतिशत से बढ़कर 36 प्रतिशत हो गया, जिससे यह सबसे प्रमुख तकनीकी निवेश के रूप में उभरा। इसके बाद क्लाउड कंप्यूटिंग में 35 प्रतिशत और ग्राहक संबंध प्रबंधन प्रणालियों में 30 प्रतिशत निवेश दर्ज किया गया। खास बात यह रही कि 41 प्रतिशत उद्योगों ने कारोबारी सलाह और निर्णय लेने के लिए एआई उपकरणों का इस्तेमाल किया, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 25 प्रतिशत था। कई व्यवसायों का कहना है कि तकनीक में किए गए निवेश से पिछले 12 महीनों में उनके मुनाफे में सुधार हुआ है, जो यह दिखाता है कि डिजिटल तकनीक अब भारतीय एमएसएमई के विकास का अहम आधार बन चुकी है। यही बदलाव नवाचार को भी नई रफ्तार दे रहा है। सर्वेक्षण के अनुसार, 44 प्रतिशत भारतीय एमएसएमई वर्ष 2026 में नए उत्पाद या सेवाएँ लॉन्च करने की योजना बना रहे हैं, जो सर्वेक्षण के औसत 29 प्रतिशत से काफी अधिक है।
साइबर सुरक्षा के बढ़ते जोखिम: जैसे-जैसे कारोबार में डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे भी तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि 59 प्रतिशत उद्योगों ने वर्ष 2025 की दूसरी छमाही में अपनी साइबर सुरक्षा व्यवस्थाओं की समीक्षा की, फिर भी 47 प्रतिशत उद्योगों ने माना कि उन्हें साइबर हमलों के कारण समय या धन का नुकसान उठाना पड़ा। इसके अलावा, भारत के आधे एमएसएमई का मानना है कि इस वर्ष उन्हें साइबर हमले का सामना करना पड़ सकता है। ये दोनों आंकड़े एशिया-प्रशांत क्षेत्र के औसत से अधिक हैं, जो बढ़ते डिजिटल जोखिमों और मजबूत साइबर सुरक्षा की जरूरत को स्पष्ट रूप से दिखाते हैं।
श्री तलाटी ने कहा कि सरकारी पहलें भारतीय एमएसएमई को डिजिटल और वैश्विक स्तर पर विस्तार करने में महत्वपूर्ण मदद दे रही हैं। उन्होंने कहा, “भारत सरकार एमएसएमई के लिए ऐसा डिजिटल कारोबार ढांचा तैयार कर रही है, जो आसान और कम लागत वाला हो, ताकि छोटे व्यवसाय भी बिना बड़ी बाधाओं के डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ सकें। ‘रैंप’ के तहत ‘टीम’ जैसे कार्यक्रम एमएसएमई को ‘ओएनडीसी’ से जोड़ने में मदद कर रहे हैं, जिससे उन्हें भारी निवेश किए बिना डिजिटल स्टोर, भुगतान और लॉजिस्टिक्स जैसी सुविधाएँ मिल पा रही हैं। इसके साथ ही, एआई का बढ़ता उपयोग उत्पादकता बढ़ाने और वित्तीय प्रदर्शन को मजबूत करने में मदद कर सकता है। फिलहाल अधिकांश एमएसएमई एआई का इस्तेमाल मार्केटिंग और कामकाज को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कर रहे हैं, इसलिए यह तकनीक नौकरियाँ कम करने के बजाय काम की क्षमता बढ़ाने में अधिक सहायक साबित होगी। हालांकि, डिजिटल अर्थव्यवस्था में सुरक्षित और लंबे समय तक टिकाऊ तरीके से काम करने के लिए साइबर सुरक्षा और डेटा सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है।”
80 प्रतिशत उद्योगों ने लिया बाहरी वित्त का सहारा: वर्ष 2025 में बाहरी वित्त यानी फंडिंग की मांग मजबूत बनी रही। पाँच में से चार भारतीय एमएसएमई को कारोबार चलाने या विस्तार के लिए बाहरी वित्त की जरूरत पड़ी, जो 2024 के 72 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है। वहीं, 53 प्रतिशत उद्योगों ने कहा कि वित्त जुटाना उनके लिए आसान या बहुत आसान रहा, जो बेहतर होती वित्तीय परिस्थितियों का संकेत देता है। सर्वेक्षण के अनुसार, फंडिंग लेने का सबसे बड़ा कारण कारोबार का विस्तार था, जिसका उल्लेख 69 प्रतिशत प्रतिभागियों ने किया। बैंक अब भी वित्त जुटाने का प्रमुख स्रोत बने हुए हैं, जबकि परिवार, निवेशकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों से भी उद्योगों को सहयोग मिल रहा है। श्री तलाटी के मुताबिक, “बाहरी वित्त तक बेहतर पहुंच और मजबूत वित्तीय प्रबंधन, एमएसएमई के विकास में अहम भूमिका निभाएंगे। कुशल प्रतिभाओं और नई तकनीकों में रणनीतिक निवेश से उद्योगों को प्रतिस्पर्धा में आगे बने रहने में मदद मिलेगी। ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (टीआरईडीएस) जैसे मंच कॉर्पोरेट और सरकारी खरीदारों से मिलने वाली बकाया राशि के बदले जल्दी वित्त उपलब्ध कराकर कार्यशील पूंजी तक आसान पहुंच सुनिश्चित कर रहे हैं। वहीं, हाल ही में घोषित ‘आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना 5.0’ वित्त तक पहुंच को और आसान बना सकती है तथा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से पैदा हुई वित्तीय चुनौतियों से निपटने में एमएसएमई की मदद कर सकती है।” सीपीए ऑस्ट्रेलिया द्वारा यह सर्वेक्षण नवंबर और दिसंबर 2025 के दौरान किया गया। इस अध्ययन में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 11 प्रमुख बाजारों के 20 से कम कर्मचारियों वाले 4,166 लघु उद्योगों की राय शामिल की गई, जिनमें भारत के 513 प्रतिभागी भी शामिल थे।