चंद्रयान-2 मिशन में रूस ने दिया था भारत को 'धोखा', ISRO को 7 साल का करना पड़ा था इंतजार

Updated on 23-08-2023 01:29 PM
मॉस्को: आज पूरी दुनिया कि निगाहें चंद्रमा पर टिकी हैं। आज शाम को भारत का चंद्रयान 3 चंद्रमा की सतह पर उतरने वाला है। पूरी दुनिया की निगाहें भारत के इस मिशन पर टिकी हुई हैं। आज तक कोई भी देश चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड नहीं कर सका है। हाल में ही रूस के लूना-25 की दुर्घटना ने ऐसे जटिल मिशन को लेकर लोगों के दिलों में डर को और ज्यादा बढ़ा दिया है। इसके बावजूद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक दिन-रात एक कर चंद्रयान 3 को चंद्रमा पर सुरक्षित उतारने के मिशन में जुटे हुए हैं। इस मिशन में भारत की सहायता 2019 में भेजे गए चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर भी कर रहा है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि चंद्रयान-2 मिशन में पहले रूस भारत का भागीदार था, लेकिन इसरो को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।

रूस से आना था चंद्रयान-2 का लैंडर

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, रूस का लूना-25 शनिवार को चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस अंतरिक्ष यान में लगे लैंडर का एक पुराना वेरिएंट भारत के चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान पर जाना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। चंद्रयान-2 मिशन में एक लैंडर और रोवर शामिल था, जिसे मूल रूप से 2011-12 के बीच लॉन्च किया जाना था। उस समय भारत ने अपने लैंडर और रोवर को विकसित नहीं किया था। मूल चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान को रूस के साथ संयुक्त मिशन के तौर पर डिजाइन किया गया था। इसमें भारत को रॉकेट और ऑर्बिटर उपलब्ध कराना था, जबकि लैंडर और रोवर रूस से आने थे।

चंद्रयान-2 मिशन से कैसे बाहर हुआ रूस


हालांकि, चंद्रयान-2 के लिए रूस जिस तरह के लैंडर और रोवर विकसित कर रहा था, उसमें एक अलग मिशन पर समस्याएं सामने आईं। इसके बाद रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस को लैंडर की डिजाइन में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा। नया डिजाइन बड़ा था और इसे भारतीय रॉकेट में आसानी से फिट नहीं किया जा सकता था। अंतर में रूस चंद्रयान-2 मिशन से बाहर हो गया और भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो को स्वदेशी लैंडर और रोवर के विकास में लगना पड़ा । इस काम में 7 साल का समय लगा और चंद्रयान-2 को 2019 में लॉन्च किया जा सका।


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