संजीवनी ने “द पिंक टैग प्रोजेक्ट” लॉन्च किया

Updated on 20-01-2026 07:49 PM

मुंबई : फेडरल बैंक हॉरमिस मेमोरियल फाउंडेशन, न्यूज18 नेटवर्क और नॉलेज पार्टनर टाटा ट्रस्ट्स द्वारा शुरू की गई परिवर्तनकारी पहल “संजीवनी: यूनाइटेड अगेंस्ट कैंसर” के तीसरे संस्करण में “द पिंक टैग प्रोजेक्ट” लॉन्च किया गया है। यह एक अनोखी और असरदार व्यवहार परिवर्तन पहल है, जो महिलाओं तक उनके सबसे निजी और व्यक्तिगत पलों में पहुंचती है और उन्हें यह याद दिलाती है कि अपनी देखभाल कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा लिए जरूरी है।

भारत में हर चार मिनट में एक महिला को स्तन कैंसर का निदान होता है। हर आठ मिनट में एक महिला इस बीमारी के कारण अपनी जान गंवा देती है। छोटे शहरों और गांवों में, जहां जानकारी की कमी है और सामाजिक झिझक ज्यादा है, वहां स्तन स्वास्थ्य पर बातचीत लगभग नहीं होती। महिलाएं शायद ही कभी अपने लिए समय निकाल पाती हैं। घर के काम, रोजगार और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उनका खुद का स्वास्थ्य पीछे छूट जाता है। जब तक कोई गंभीर संकट सामने नहीं आता, तब तक उनकी सेहत अनदेखी, टाली हुई और भुला दी जाती है।

दिल को छूने वाला एक छोटा टैग: पिंक टैग प्रोजेक्ट एक बहुत ही सरल लेकिन गहरे विचार से जन्मा है। एक महिला के दिन का सबसे निजी पल, जब वह कपडे पहनती है, वही पल उसकी सेहत को लेकर जागरूकता जगाने का सबसे ताकतवर समय बन सकता है। इसका समाधान बहुत आसान और समझने योग्य है। एक छोटा गुलाबी रंग का टैग, जिस पर स्तन की स्वयं जांच कैसे करें, इसकी साफ-साफ जानकारी लिखी होती है। इस टैग को ब्लाउज, कुर्ता या अंदर पहनने वाले कपडों के अंदर, कपडें धोने की सूचना देनेवाले टैग के पास सिल दिया जाता है। जहां महिला अकेली होती है और खुद पर ध्यान देती है, वहीं यह पिंक टैग उसे चुपचाप लेकिन साफ तरीके से याद दिलाता है। यह कोई ऐसा अभियान नहीं है जो उसका समय मांगे या किसी सेमिनार में जाना पडें। यह तो रोजमर्रा के जीवन में कपडों के साथ बुना हुआ एक छोटा सा संदेश है।

कपडे पर जागरूकता की सिलाई: पिंक टैग प्रोजेक्ट की पूरी कहानी को एक प्रभावशाली शॉर्ट फिल्म में दिखाया गया है। इस फिल्म को मशहूर अभिनेत्री शीबा चड्ढा ने आवाज दी है। फिल्म की शुरुआत एक कडवी सच्चाई से होती है। भारत में हर चार मिनट में एक महिला को स्तन कैंसर होता है, फिर भी छोटे शहरों में सन्नाटा पसरा रहता है। फिल्म में महिलाओं को उनके रोज़ के काम करते हुए दिखाया गया है, जैसे पानी भरना, आंगन साफ करना, खाना बनाना और कपडे पहनना।

एक मजबूत संदेश: फिर आता है वह खास पल। जब महिला ब्लाउज के हुक लगाती है, साडी की प्लीट ठीक करती है, कुर्ता पहनती है, तब उसकी नजर पिंक टैग पर पडती है। एक शांत लेकिन लगातार याद दिलाने वाला संकेत। महिलाएं उसे देखती हैं, पढती हैं और सवाल पूछती हैं। स्थानीय स्वयंसेवक, जो प्रशिक्षित और भरोसेमंद होते हैं, उन्हें समझाते हैं। घरों में बातचीत शुरू होती है। बेटियां अपनी मां को दिखाती हैं। पोतियां अपनी दादियों को याद दिलाती हैं। जो चीज जिज्ञासा से शुरू होती है, वह बातचीत बनती है और फिर एक आंदोलन का रूप ले लेती है।

इस पहल पर बात करते हुए फेडरल बैंक के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर श्री एम. वी. एस. मूर्ति ने कहा, “फेडरल बैंक हॉरमिस मेमोरियल फाउंडेशन में हमारा मानना है कि असली बदलाव बडे और दिखावटी अभियानों से नहीं आता। बदलाव उन प्रयासों से आता है जो धीरे से, लगातार और संवेदनशीलता के साथ लोगों तक पहुंचते हैं। पिंक टैग प्रोजेक्ट व्यवहार आधारित डिजाइन की ताकत को दिखाता है। स्थानीय दर्जीयों और स्वयंसेवकों के साथ मिलकर हमने एक साधारण कपडे को जीवन बचाने वाला साधन बना दिया है। यह दान नहीं है, यह सशक्तिकरण है। यह महिलाओं से वहीं मिलने की कोशिश है जहां वे हैं, उनके रोज़मर्रा के जीवन में, और उन्हें खुद की रक्षा करने की ताकत देना है। जब स्वयं की देखभाल एक आदत बन जाती है, तब जीवन की रक्षा संभव होती है। पिंक टैग प्रोजेक्ट हमारे समुदायों के प्रति हमारे लगातार और लंबे समय के दृष्टिकोण को दिखाता है।  न्यूज18 स्टूडियोज के श्री सीओओ सिद्धार्थ सैनी ने बताया कि, नेटवर्क18 के लिए पहुंच महत्वपूर्ण है, लेकिन भागीदारी उससे भी ज्यादा जरूरी है। हमारे सामाजिक प्रयास असली मानवीय समझ पर आधारित हैं। लोग कैसे जीते हैं, वे क्या देखते हैं और क्या उनके साथ रह जाता है। संजीवनी पहल का हिस्सा बना पिंक टैग प्रोजेक्ट, एक छोटे डिजाइन को स्तन कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए रोज़ का याद दिलाने वाला साधन बना देता है। यह कोई बाधा नहीं है, बल्कि जीवन का हिस्सा है। जब कोई संदेश रोज़ लोगों के साथ रहता है, तो बदलाव के लिए ध्यान खींचने की ज़रूरत नहीं पड़ती, वह खुद एक आदत बन जाता है। हडलर्स इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड के सह-संस्थापक और सीईओ श्री सुरोजित सेन ने कहा,
संजीवनी पहल पर काम करते हुए हमें लोगों के व्यवहार को गहराई से समझने का मौका मिला, खासतौर पर कैंसर जांच के नजरिए से। किसी के पास जांच के लिए समय नहीं होता, खासकर महिलाओं के पास, जिन्हें अपने स्वास्थ्य के लिए भी मुश्किल से समय मिलता है। तभी हमें एक ऐसा पल मिला, जब महिला अकेली होती है और खुद पर ध्यान देती है, यानी कपडे पहनते समय। यह रोज़ का पल है। हमें लगा कि जीवन बचाने वाला संदेश उसी पल में जोड देना चाहिए। पिंक टैग प्रोजेक्ट सिर्फ एक अभियान नहीं है, बल्कि एक साधारण कपडे के टैग के रूप में पेश किया गया व्यवहार परिवर्तन का प्रयास है। शुरुआती प्रतिक्रिया बहुत मजबूत रही है, क्योंकि यह दिखावटी नहीं है, यह सच्चा है, ज़रूरी है और सचमुच उनके जीवन में बुना हुआ है।”

व्यवहार में बदलाव: पिंक टैग प्रोजेक्ट तीन अहम बदलाव लाता है।

पहला, यह बातचीत को सामान्य बनाता है। जब महिला टैग देखती है, तब उसे समज में आता है कि वह क्या टालती आ रही थी। यानी स्तन स्वास्थ्य उसकी अपनी जिम्मेदारी है। स्थानीय स्वयंसेवक, जो उसी इलाके के होते हैं, वही भाषा बोलते हैं और वही डर समझते हैं, बातचीत को आसान और भरोसेमंद बनाते हैं। यह टैग डर पैदा नहीं करता, बल्कि बात शुरू करने का जरिया बनता है।

दूसरा, यह शुरुआती जांच को रोज़ की आदत में बदल देता है। हर बार कपडे पहनते समय याद दिलाता है। सिर्फ एक बार नहीं, हर दिन। यही लगातार याद दिलाना जागरूकता को आदत में बदल देता है। टैग को याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वह कपडे में ही सिलाया गया होता है।

तीसरा, यह महिलाओं को खुद कदम उठाने की ताकत देता है। पिंक टैग महिलाओं से तुरंत अस्पताल जाने या लक्षणों का इंतजार करने को नहीं कहता। यह उन्हें जानकारी, तरीका और सही समय देता है। स्तन की स्वयं जांच के लिए न किसी मशीन की जरूरत है, न अपॉइंटमेंट की, न पैसों की। बस जागरूकता और पहल चाहिए। पिंक टैग यह दोनों देता है, ठीक उसी पल में जब महिला सबसे ज्यादा सुनने और समझने के लिए तैयार होती है, यानी जब वह खुद के साथ अकेली होती है।

इस पहल की खूबसूरती इसकी सादगी में है। यह एक ऐसा व्यवहार परिवर्तन अभियान है, जो महिलाओं के समय का सम्मान करता है, उनकी सच्चाई को समझता है और उनसे वहीं मिलता है जहां वे वास्तव में होती हैं। न क्लिनिक में, न सेमिनार में, बल्कि उन निजी पलों में जो उनके पूरे दिन को आकार देते हैं। यह फिल्म संजीवनी के डिजिटल प्लेटफॉर्म, न्यूज़18 नेटवर्क के प्रसारण चैनलों और चुनिंदा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध है।

 

 

 


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