सू की को फिर 6 साल की सजा:भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी करार

Updated on 16-08-2022 06:22 PM



सैन्य शासित म्यांमार के एक कोर्ट ने सोमवार को विपक्षी नेता आंग सान सू की की सजा 6 साल और बढ़ा दी। इस बार उन्हें भ्रष्टाचार के कई आरोपों में दोषी ठहराया गया है। सू की पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग कर सार्वजनिक जमीन को बाजार से कम कीमतों पर किराए पर लिया और चैरिटी के नाम पर पैसे लेकर वहां घर बनाया।

उन्हें चार मामलों में तीन-तीन साल की सजा सुनाई गई। तीन मामलों की सजा एक साथ चलेंगी। सू ने खुद पर लगे सभी आरोपों से इनकार किया।

पहले से ही 11 साल की सजा चल रही
कोर्ट ने उन्हें पहले से ही सेना के खिलाफ असंतोष भड़काने और कोरोना नियम तोड़ने का दोषी माना हुआ है। म्यांमार में 1 फरवरी 2021 की रात सेना ने तख्तापलट करते हुए सू को हाउस अरेस्ट कर लिया था। उन्हें पहले से ही देशद्रोह, भ्रष्टाचार और अन्य आरोपों में 11 साल जेल की सजा सुनाई जा चुकी है।

सू की और उनके सहयोगियों पर कई आरोप
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सू की और उनके सहयोगियों के खिलाफ कई झूठे आरोप सेना की सत्ता की जब्ती के लिए लगाए गए हैं। म्यांमार में साल 2020 में आम चुनाव करवाए गये थे, जिसमें आंग सान सू की की पार्टी को एकतरफा जीत मिली थी और उसके साथ ही देश में सैन्य शासन का अंत हो गया था।

लेकिन, सेना के खिलाफ ये संघर्ष लंबा नहीं चल सका और पिछले साल एक फरवरी को सेना ने लोकतांत्रिक सत्ता का तख्तापलट कर दिया। वहीं, आंग सान सू ची समेत उनकी 'नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी' के तमाम बड़े नेताओं को सेना ने गिरफ्तार कर लिया था। उसके बाद से ही म्यांमार में सेना के खिलाफ भारी प्रदर्शन किए जा रहे हैं और अभी तक 2100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

तख्तापलट क्यों?
नवंबर 2020 में म्यांमार में आम चुनाव हुए थे। इनमें आंग सान सू की की पार्टी ने दोनों सदनों में 396 सीटें जीती थीं। उनकी पार्टी ने लोअर हाउस की 330 में से 258 और अपर हाउस की 168 में से 138 सीटें जीतीं। म्यांमार की मुख्य विपक्षी पार्टी यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी ने दोनों सदनों में मात्र 33 सीटें ही जीतीं। इस पार्टी को सेना का समर्थन हासिल था। इस पार्टी के नेता थान हिते हैं, जो सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुके हैं।

नतीजे आने के बाद वहां की सेना ने इस पर सवाल खड़े कर दिए। सेना ने चुनाव में सू की की पार्टी पर धांधली करने का आरोप लगाया था। इसे लेकर सेना ने सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और चुनाव आयोग की शिकायत भी की। चुनाव नतीजों के बाद से ही लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार और वहां की सेना के बीच मतभेद शुरू हो गया था।


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