राहुल गांधी क्या फिर बिगाड़ेंगे खेल? इस वोट बैंक की नाराजगी दे सकती है कांग्रेस को बड़ी चोट

Updated on 27-01-2026 12:53 PM
पटना: 2022 में गुलाब नबी आजाद और अब बिहार के बड़े कांग्रेसी नेता शकील अहमद का जाना और राहुल गांधी पर खुला प्रहार करना...सियासी पंडित इसे कांग्रेस के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं। शकील अहमद ने बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़ दी और पार्टी में अंदरुनी कलह का आरोप लगाया। उसके बाद हुए बिहार चुनावों में कांग्रेस पार्टी 19 सीट से सिमटकर 6 सीट पर आ गई। मुस्लिम नेताओं की नाराजगी कांग्रेस के सामने तब पैदा हुई है, जब असम, केरल, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में मुस्लिम वोटर काफी प्रभावी हैं।

मुस्लिम आबादी बहुल राज्यों में क्या बनेगा समीकरण


शकील अहमद ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी मुसलमानों से लगातार दूरी बना रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी अब अल्पसंख्यकों को सिर्फ वोट बैंक समझती है, जबकि जमीनी स्तर पर उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा के मुताबिक मुस्लिम बहुल आबादी वाले राज्यों में चुनाव से पहले कांग्रेस और राहुल गांधी पर ऐसे आरोप बड़ी चोट दे सकते हैं। शकील अहमद का यह विस्फोट ऐसे वक्त हुआ है, जब पश्चिम बंगाल, केरल और असम में चुनाव नजदीक हैं। पश्चिम बंगाल में जहां 24 फीसदी मुस्लिम आबादह है, वहीं केरल में 27 फीसदी हैं। असम में यह आंकड़ा 34 फीसदी के आसपास है। कांग्रेस इन वोटों के सहारे सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही थी, लेकिन ताजा घटनाक्रम से यह गणित बिगड़ता नजर आ रहा है।

गुलाम नबी आजाद ने कब किया था किनारा


शर्मा के मुताबिक शकील अहमद की गिनती कांग्रेस के बड़े नेताओं में होती है। वह बिहार कांग्रेस की कमान संभाल चुके हैं और केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे हैं। उनसे पहले गुलाम नबी आजाद ने अगस्त 2022 में कांग्रेस के साथ अपना 50 साल पुराना नाता तोड़ा था। उन्होंने भी राहुल गांधी पर खुला प्रहार किया था। उन्होंने राहुल गांधी को इम्मैच्योर और बचकानी हरकत करने वाला बताया था और आरोप लगाया था कि उनके आने के बाद से पार्टी का सलाहकार मंडल पूरी तरह ध्वस्त हो गया है

मुस्लिम वोटर के लिए कौन-कौन विकल्प


शर्मा बताते हैं कि एक समय था जब मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस का सबसे मजबूत आधार माना जाता था। यूपीए सरकार के दौरान सच्चर कमेटी की सिफारिशों से लेकर कई योजनाएं इसी वर्ग को ध्यान में रखकर लाई गईं। तब कांग्रेस पर तुष्टिकरण का आरोप लगता था। लेकिन वक्त के साथ मुस्लिम वोटर भी राजनीतिक रूप से ज्यादा सजग हुए हैं। उन्होंने जीतने वाले विकल्पों को चुनना शुरू कर दिया है। इसमें कहीं तृणमूल कांग्रेस, कहीं आरजेडी, कहीं एआईएमआईएम और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को कांग्रेस का विकल्प बनाया। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक धीरे-धीरे खिसकता चला गया।

छोटी पार्टियां कैसे दे रहीं झटका


कई राज्यों में मुस्लिम नेतृत्व वाली छोटी पार्टियां भी उभरी हैं। भले ही वे सत्ता तक न पहुंचें, लेकिन कांग्रेस के वोट काटने में सफल रहीं। पश्चिम बंगाल में फुरफुरा शरीफ से इंडियन सेक्युलर फ्रंट और असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी इसका बड़ा उदाहरण हैं। जानकारों के मुताबिक, बीजेपी की लगातार चुनावी जीत और हिंदुत्व एजेंडे की सफलता ने कांग्रेस को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया। पार्टी ने अचानक राहुल गांधी को जनेऊधारी ब्राह्मण, शिव भक्त और कैलाश मानसरोवर यात्री के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया। हालांकि, यह एक्सपेरिमेंट न तो हिंदू वोटरों को आकर्षित कर पाया और न ही मुस्लिम समुदाय को भरोसे में ले सका। उल्टे मुस्लिम नेताओं और कार्यकर्ताओं में यह भावना गहरी हुई कि पार्टी उन्हें नजरअंदाज कर रही है।

क्यों बढ़ रहा पार्टी के भीतर असंतोष


मामला यहीं नहीं रुका है। कांग्रेस में अब भी मौजूद मुस्लिम नेता जैसे तारिक अनवर और राशिद अल्वी भी शकील अहमद के सुर में सुर मिलाते दिख रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, कई मुस्लिम नेता खुद को टिकट बांटने, संगठन और प्रचार से दूर महसूस कर रहे हैं। यहां तक आरोप लग रहे हैं कि राहुल गांधी अल्पसंख्यक नेताओं के साथ सार्वजनिक मंचों पर तस्वीरें खिंचवाने से भी बचते हैं।

क्या राहुल गांधी बदल पाएंगे हालात?


ताजा घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी उस समुदाय को फिर से साथ ला पाएंगे, जो दशकों तक कांग्रेस की रीढ़ रहा है, लेकिन अब खुद को ठगा और उपेक्षित महसूस कर रहा है? हालांकि इतना तय है कि आने वाले विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा और नेतृत्व की अग्निपरीक्षा साबित होंगे।

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