12 निकाह करने वाले पिता से ताउम्र नफरत करते रहे साहिर लुधियानवी! लता मंगेशकर से कर बैठे थे अदावत

Updated on 25-10-2023 03:51 PM
कुछ इसी तरह थी साहिर लुधियानवी की जिंदगी भी। जिनके बारे में जितना लिखा जाए कम है, जितना पढ़ा जाए वो भी कम है। बचपन से लेकर आखिरी सांस तक, उनकी जिंदगी के तमाम सिरे हैं। उनकी नज्में, उनकी शायरी, उनके गाने, उनकी मोहब्बत, उनकी नफरत, उनकी दिल्लगी...। शब्दों के इस जादूगर के किस्से भी ऐसे, कि पढ़ो, तो पढ़ते ही चले जाओ। एक किस्सा लता मंगेशकर से अदावत का, एक किस्सा सुधा मल्होत्रा से जाजिबीयत का। एक किस्सा मोहब्बत का, जो उन्होंने ताउम्र अपनी मां सरदार बेगम से किया। एक किस्सा नफरत का, जो उन्होंने अपने पिता फजल मोहम्मद से मरते दम तक किया। आज उनकी डेथ एनिवर्सिरी है। आइये जानते हैं उनके बारे में कुछ अनसुने और अनकहे किस्से।

Sahir Ludhianvi का जन्म 8 मार्च 1921 को करीमपुरा, लुधियाना, पंजाब, ब्रिटिश भारत में एक पंजाबी मुस्लिम परिवार में हुआ था। यही कारण है कि उन्होंने अपने नाम के आगे 'लुधियानवी' शब्द जोड़ लिया। उनकी मां सरदार बेगम ने अपने पति फजल मोहम्मद को छोड़ दिया था। कहते हैं कि साहिर के पिता ने 12 निकाह किए थे। उनके घर के बगल में अब्दुल हई नाम का आदमी रहता था, जिससे साहिर के पिता की बनती नहीं थी। उन्होंने उस आदमी को खरी-खोटी सुनाने के लिए बेटे का नाम भी अब्दुल हई रख दिया। साल 1934 में साहिर के पिता ने पुनर्विवाह किया और अपने बेटे की कस्टडी के लिए मुकदमा दायर किया।

मां से प्यार और पिता से नफरत

अमेरिका के लेखक सुरिंदर देयोल की लिखी 'साहिर: ए लिटरेरी पोर्ट्रेट' में कुछ किस्से हैं, जिससे सालों तक साहिर के दोस्त रहे पाकिस्तानी कवि अहमद राही भी सहमत हैं। इस किताब में जिक्र है, 'अपनी पूरी जिंदगी में साहिर ने एक बार प्यार किया और एक ही बार नफरत की। वो अपनी मां से प्यार करता था और वो अपने पिता से नफरत करता था।' साहिर की मां को अपने पति से प्रोटेक्शन की जरूरत थी और उन्होंने आर्थिक तंगी का भी सामना किया।

अमेरिका के लेखक सुरिंदर देयोल की लिखी 'साहिर: ए लिटरेरी पोर्ट्रेट' में कुछ किस्से हैं, जिससे सालों तक साहिर के दोस्त रहे पाकिस्तानी कवि अहमद राही भी सहमत हैं। इस किताब में जिक्र है, 'अपनी पूरी जिंदगी में साहिर ने एक बार प्यार किया और एक ही बार नफरत की। वो अपनी मां से प्यार करता था और वो अपने पिता से नफरत करता था।' साहिर की मां को अपने पति से प्रोटेक्शन की जरूरत थी और उन्होंने आर्थिक तंगी का भी सामना किया।

साहिर लुधियानवी की पढ़ाई-लिखाई

साहिर की पढ़ाई-लिखाई लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने लुधियाना के सरकारी कॉलेज में एडमिशन लिया। वहां के ऑडिटोरियम का नाम उनके नाम पर रखा गया है। एक कॉलेज स्टूडेंट के रूप में साहिर अपनी गजलों-नज़्मों और दिल छू लेने वाली स्पीच के कारण फेमस थे।

पाकिस्तान सरकार ने जारी किया गिरफ्तारी वारंट

1943 में साहिर लाहौर शिफ्ट हो गए थे। 1945 तक उनकी पहली किताब 'तल्खियां' (उर्दू) पब्लिश हुई। कई उर्दू मैगजीन एडिट की। 'ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन' के मेंबर रहे। फिर 'प्रोगेसिव राइटर्स एसोसिएशन' के मेंबर बने। जब उन्होंने कम्युनिज्म को बढ़ावा देने वाले विवादित बयान दिए तो पाकिस्तान की सरकार ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था। 1949 में वो भारत आ गए। वो लाहौर से दिल्ली शिफ्ट हो गए और फिर इसके 8 हफ्ते बाद मुंबई में बसने चले गए। 70 के दशक में उन्होंने अपना बंगला बनाया, जिसका नाम 'परछाइयां' रखा। इसी बंगले में उन्होंने आखिरी सांस ली थी।

इंडस्ट्री में ऐसे हुई थी शुरुआत

फिल्म इंडस्ट्री में साहिर ने बतौर लिरिसिस्ट काम करना शुरू किया। बतौर कवि पहले उनकी उतनी कमाई नहीं होती थी, जोकि इंडस्ट्री में गाने लिखने के बाद होने लगी और उनकी आर्थिक तंगी दूर हुई। उन्होंने 1949 में ही 'आजादी की राह पर' में चार गानों के साथ अपनी शुरुआत की और इसके बाद इतिहास के पन्नों पर उनका नाम दर्ज हो गया। हालांकि, इस मूवी से नहीं, बल्कि 1951 में 'नौजवान' से एसडी बर्मन के साथ उन्हें पहचान मिली। 'बाजी' से खूब सफलता मिली। साहिर को तब गुरुदत्त की टीम का हिस्सा माना जाता था। एसडी बर्मन के साथ साहिर की आखिरी फिल्म प्यासा (1957) थी। 'प्यासा' में गुरु दत्त ने विजय नाम के कवि का किरदार निभाया था। इस फिल्म के बाद साहिर और एसडी बर्मन में आर्टिस्टिक और कॉन्ट्रैक्ट को लेकर मतभेद हुआ और वे अलग हो गए।

लता मंगेशकर संग तल्खी

साहिर के हिट गानों में 'साथी हाथ बढ़ाना', 'औरत ने जनम दिया मर्दों को', 'मैं पल दो पल का शायर हूं', 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम' सहित कई बॉलीवुड गाने शामिल हैं। उनका और लता मंगेशकर से जुड़ा एक किस्सा है। दोनों ने 2 साल तक साथ काम नहीं किया था, जबकि इससे पहले उनके गानों को बहुत पसंद किया गया था। दरअसल, एक फिल्ममेकर ने लता के सामने ही साहिर से कह दिया कि लता अगर उनके गाने ना गाए तो वे बेजान ही हैं। ये बात साहिर को चुभ गई। उन्होंने ताव में आकर ठान लिया कि वो लता के साथ काम नहीं करेंगे। वो साबित करेंगे कि उनकी शायदी, कविताएं और नज्में, लता की आवाज की मोहताज नहीं है। फिर उनके गाने सुधा मल्होत्रा ने गाए और यहीं से साहिर का नाम सुधा से जुड़ने लगा।

कौन थीं सुधा, जिनसे जुड़ा साहिर का नाम!

सुधा मल्होत्रा भी प्लेबैक सिंगर थीं। उन्हें भारत सरकार ने पद्म श्री से भी नवाजा गया। उन्होंने गिरिधर मोटवानी से शादी की थी, लेकिन शादी के बाद साहिर संग उनकी फोटो एक मैगजीन में पब्लिश हुई और दोनों का नाम जुड़ने लगा। सुधा ने कई दफा इस बात का खंडन किया। कहते हैं कि जब सुधा की शादी तय हो गई थी तो साहिर ने गाना लिखा था,

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