अलाव में डाली थिनर की बॉटल, झुलसने से मासूम की मौत

Updated on 04-01-2022 07:13 PM

 भोपाल ठंड से बचने जलाए गए अलाव में नासमझी से  थिनर से भरी एक प्लास्टिक की बोतल डाल दीजिसके फटने से दो साल की मासूम बच्ची की उसकी चपेट में गई। इस हादसे में मासूम की जान चली गई। बीते शनिवार को ग्राम अरंडिया में रहने वाली दो साल की जयश्री पुत्री विनोद सोलंकी की आग की चपेट में आने से मौत हो गई।लसुडिया थाना पुलिस ने मर्ग कायम कर पोस्टमार्टम कराकर शव स्वजनों को सौंप दिया है।पिता विनोद ने बताया कि वे लसुड़िया में रहने वाले काका ससुर के यहां गए थे।

घर के बाहर बच्चों ने कचरा डालकर अलाव जला लिया। यहां जयश्री, काका ससुर की बेटी तन्नु और उसका भाई सनी तीनों साथ में अलाव में हाथ सेंक रहे थे।पास में एक प्लास्टिक की बोतल पड़ी थी, जिसमें थिनर था। किसी बच्चे ने उसे अलाव में डाल दिया।कुछ देर बाद थिनर की बोतल जोरदार धमाके के साथ फट गई। इसमें जयश्री और आठ वर्षीय तनवी उर्फ तन्नु सकलेचा बुरी तरह झुलस गईं।आग की चपेट में आई दोनों बच्चियों को देख तन्नु की मां ने पल्लू से आग बुझाने की कोशिश भी लेकिन जब तक आग बुझी तब तक दोनों गंभीर रूप से घायल हो चुकी थीं। दोनों को अरबिंदो अस्पताल में भर्ती कराया था।

तन्नु की 24 दिसंबर को मौत हो गई थी।वहीं जयश्री का अरबिंदो में इलाज चल रहा था, लेकिन इलाज के दौरान शनिवार को उसने में भी दम तोड़ दिया। डाक्टर सलिल भार्गव ने बताया कि घर में बच्चे हैं तो अंगीठी या अलाव जलाने से बचें।थोड़ी सी भी असावधानी बड़े हादसे का कारण बन जाती है।वहीं यदि कोयला या अलाव जलाने से कार्बन के अलावा कई जहरीली गैसें निकलती हैं। कोयला बंद कमरे में जल रहा हो, तो इससे एनवायरनमेंट में कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है और ऑक्सीजन का लेवल घट जाता है। यह कार्बन, ब्रेन पर सीधे असर डालता है और सांसों के जरिए बॉडी के अंदर भी पहुंचता है।

ब्रेन पर असर होने से कमरे में सोया कोई भी इंसान बेहोश हो सकता है। ब्लड में यह कार्बन घुलकर धीरे-धीरे ऑक्सीजन को कम कर देता है। बंद कमरे में लंबे समय तक ब्लोअर या हीटर जलाने से कमरे का तापमान बढ़ जाता है और नमी का लेवल कम हो जाता है। इस वजह से नॉर्मल लोगों को भी सांस संबंधी समस्या हो सकती है। अगर आप हीटर का प्रयोग करते हैं, तो कमरे में एक बाल्टी पानी रखें, जिससे कुछ हद तक नमी बनी रहे।

हीटर, ब्लोअर या अंगीठी जलाते समय कमरे को पूरी तरह से बंद नहीं करना चाहिए। गर्मी से धीरे-धीरे कमरे का ऑक्सीजन खत्म हो जाता है और कार्बन मोनोऑक्साइड ज्यादा होने लगता है। यह जहरीली गैस सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच कर खून में मिल जाती है। इस वजह से खून में हीमोग्लोबिन का लेवल घट जाता है और बेहोशी छाने लगती है और इंसान की मौत हो जाती है।


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