स्ट्रोक के शुरुआती 60 मिनट में इलाज से मस्तिष्क को होने वाला नुकसान रोका जा सकता है : डॉ. आयुष दुबे

Updated on 29-01-2026 06:50 PM

भोपाल : स्ट्रोक के बाद का पहला घंटाजिसे अक्सर गोल्डन ऑवर’ कहा जाता हैमरीज के बचने और रिकवरी की संभावनाओं को काफी हद तक तय करता है। इंडियन स्ट्रोक एसोसिएशन के मुताबिकभारत में हर साल करीब 18 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैंमगर अधिकांश मरीज जीवन-रक्षक उपचार के लिए अस्पताल देर से पहुँचते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि देरी का हर एक मिनट लगभग 19 लाख मस्तिष्क कोशिकाओं की मौत का कारण बन सकता हैइसलिए स्ट्रोक के लक्षणों को तुरंत पहचानना और फौरन चिकित्सा मदद लेना बेहद जरूरी है। स्ट्रोक तब होता है जब मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह रुक जाता है और उस हिस्से को ऑक्सीजन तथा पोषक तत्व नहीं मिल पाते। यदि समय पर उपचार न मिले तो कुछ ही मिनटों में मस्तिष्क को स्थायी क्षति हो सकती है। स्ट्रोक के दो प्रमुख प्रकार माने जाते हैं। पहला इस्कीमिक स्ट्रोकजिसमें रक्त का थक्का किसी नस को ब्लॉक कर देता है। दूसरा रक्तस्रावी स्ट्रोकजिसमें मस्तिष्क के अंदर या आसपास रक्तस्राव हो जाता है। डॉ. आयुष दुबेन्यूरोलॉजिस्टहमीदिया अस्पतालभोपाल ने बताया कि स्ट्रोक के मामलों में हर मिनट बहुत अहम होता है। जितनी जल्दी मरीज़ को इलाज मिलता हैउतना ज़्यादा मस्तिष्क के कामकाज को बचाया जा सकता है। कुछ ही मिनटों की देरी भी बड़ा फर्क डाल सकती है। लोगों को अचानक होने वाले लक्षणों को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिएजैसे शरीर के एक हिस्से में सुन्नपन या कमजोरीबोलने में दिक्कतचेहरे पर टेढ़ापन आना या तेज़ सिरदर्द होना। तुरंत कार्रवाई करना और तुरंत अस्पताल पहुंचना रिकवरी के मौके बढ़ाता है और लंबे समय तक रहने वाली विकलांगता के खतरे को काफी कम कर सकता है। भारत में स्ट्रोक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। स्ट्रोक अब देश में मौत का चौथा और विकलांगता का पाँचवाँ बड़ा कारण बन चुका है। अनियंत्रित ब्लड प्रेशरडायबिटीजधूम्रपानहाई कोलेस्ट्रॉल और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसे लाइफस्टाइल फैक्टर स्ट्रोक के खतरे को काफी बढ़ा देते हैं। अध्ययन बताते हैं कि भारत में 70 प्रतिशत से अधिक स्ट्रोक के मामले 70 वर्ष से कम उम्र के लोगों में सामने आते हैं। ऐसे में सभी आयु वर्गों में जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। आपातकालीन इलाज जैसे खून के थक्के घोलने वाली दवाएं (थ्रोम्बोलाइसिस) और मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टॉमी अगर गोल्डन ऑवर’ के अंदर दी जाएं तो मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसके बावजूद स्ट्रोक से बचाव ही सबसे महत्वपूर्ण है। जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलावजैसे ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखनानियमित शारीरिक गतिविधि करनासंतुलित आहार लेनाधूम्रपान छोड़ना और तनाव पर काबू रखना स्ट्रोक के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं। भारत में स्ट्रोक के बारे में जागरूकता बढ़ाना और गोल्डन आवर के भीतर मरीज को विशेषज्ञ उपचार तक पहुँचाना बहुत ज़रूरी है। हर मिनट कीमती होता है। पहले 60 मिनट के भीतर कार्रवाई करने से मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है, जबकि देरी होने पर दिमाग को होने वाला नुकसान स्थायी भी हो सकता है।


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