
साइबर ठग पहले विभिन्न माध्यमों से पीड़ितों के डाटा आधार, पैन, बैंक डिटेल, मोबाइल नंबर से लेकर सोशल मीडिया गतिविधियां तक पर नजर रखते हैं। इन जानकारियों के आधार पर वे पीड़ित की वर्चुअल प्रोफाइल बनाते हैं, ताकि उसे यह भरोसा हो कि काल करने वाला कोई सरकारी अधिकारी है।
इसके बाद शुरू होता है डराने-धमकाने का सिलसिला। पीड़ित को फोन कर बताया जाता है कि उसका नाम मनी लांड्रिंग, ड्रग तस्करी या अवैध लेनदेन के मामले में आ गया है। दावा किया जाता है कि ईडी, सीबीआई या कोर्ट में मामला दर्ज है और तुरंत वेरिफिकेशन जरूरी है।
पीड़ित को किसी ऐप के जरिए वीडियो कॉल पर जोड़ा जाता है, जहां ठग पुलिस अधिकारी के वेश में, पुलिस कार्यालय जैसी पृष्ठभूमि के साथ बैठा दिखता है। पीड़ित को परिवार या किसी अन्य से बात करने की मनाही होती है। सामान्य पूछताछ के बाद वीडियो काल में ‘अन्य एजेंसियों’ के अफसर के रूप में और लोग जुड़ते हैं, जो सख्ती से पूछताछ कर आरोप ‘सिद्ध’ कर देते हैं और फिर ‘क्लीन चिट’ के नाम पर रकम की मांग करते हैं। यह रकम सीधे ठगों के खातों में जमा कराई जाती है।
सितंबर 2024 में भोपाल के श्यामला हिल्स क्षेत्र में साइबर ठगों ने एक गैस संचालक की मां को डिजिटल अरेस्ट कर 80 लाख रुपये ठग लिए थे। आरोपियों ने उन्हें फर्जी मनी लांड्रिंग केस में फंसाया। करीब दस दिन तक डिजिटल अरेस्ट में रखा और ‘अदालत’ में पेश कर दिया। यहां नकली कोर्ट, फर्जी वकील और जज की भूमिका निभाई गई। महिला को ‘सजा’ सुनाने के बाद समझौते के नाम पर 80 लाख रुपये ले लिए गए। यह मामला क्राइम ब्रांच साइबर सेल में दर्ज हुआ था।'