
भोपाल : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के मरुग्राम मुक्ताकाश प्रदर्शनी में स्थित कच्छ गुजरात की रबारी समुदाय के भुंगा आवास प्रादर्श में कच्छ गुजरात से आए 6 कलाकारों द्वारा नवीनीकरण कार्य किया जा रहा है। इन कलाकारों के द्वारा मुख्य रूप से रबारी आवास संकुल के प्रवेश द्वार पर चित्तरकाम (दीवार पर कांच के छोटे दर्पणों को लगाना) को नवीनीकृत किया जा रहा है।इस दल के साथ आयी मुख्य रबारी कलाकार श्रीमती हासी बेन ने बताया कि कच्छ में लगभग प्रत्येक घर के प्रवेश पर चित्तरकाम किया जाता है। यह मान्यता है कि एक घर के लिए प्रवेश द्वार पर निर्मित चित्तरकाम एक पोशाक के जैसा है साथ ही यह घर को बुरी नजरों से भी बचाता है। चित्तरकाम में विभिन्न आकृतियों के निर्माण हेतु चाक मिट्टी/ सफ़ेद छुही मिट्टी को घोड़े की लीद, सन की रस्सी के बारीक टुकड़े एवं फेविकोल को मिलाकर एक आधारभूत सामग्री तैयार कर लिया जाता है इसके पश्चात मिट्टी की गीली दीवार पर छोटी लकड़ी की सहायता से चित्तरकाम हेतु बाहरी रूपरेखा/आकृति उकेरी जाती है, चित्तरकाम की इन समस्त आकृतियो को तोरण के नाम से संबोधित करते है। लकड़ी की सहायता से उकेरी गई आकृति(तोरण) पर आधारभूत सामग्री को लगाया जाता है एवं इसी में छोटे काँच के गोल दर्पण अरिसा को चिपकाया जाता है। प्रवेश द्वार पर निर्मित इस चित्तरकाम में कांवर, पक्षी, फूल_पत्तों, विभिन्न पशु आकृतियों के साथ साथ इसे बनाने वाले कलाकारों का नाम भी लिखा जाता है।
वरिष्ठ कलाकार हासी बेन के अनुसार इस कला को मुख्य रूप से समुदाय की महिला कलाकारों द्वारा ही बनाया जाता है यद्यपि पुरुषों के भाग लेने पर कोई निषेध नहीं है।