
भोपाल: भारत में ह्यूमन-वाइल्डलाइफ इंटरैक्शंस (मानव-वन्यजीव टकराव) (HWI) की बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए, दसरा ने भोपाल के क्वालिटीज़ मोटल शिराज में एक मीडिया गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन का विषय था – ‘संघर्ष से सह-अस्तित्व की ओर’। इस आयोजन में पत्रकारों, पर्यावरण विशेषज्ञों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। सभी ने इस बात पर चर्चा की कि मीडिया किस तरह लोगों को इंसान-वन्यजीव टकराव की गंभीरता को समझाने और सह-अस्तित्व की सोच को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। सम्मेलन में शामिल वक्ताओं में मनीष चंद्र मिश्रा (सहायक संपादक, मोंगाबे), रविपति यशस्वी राव (मैनेजर, द नेचर कंज़र्वेंसी), अमृता नीलकांतन (एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर, नेटवर्क फॉर कंजर्विंग सेंट्रल इंडिया), प्राजक्ता हुशंगाबादकर (सदस्य, एनसीसीआई), दीप्ति हमरास्कर (वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसाइटी), रामलाल जी और वसंत जी (फेलो, कोएक्सिस्टेंस कंसोर्टियम) शामिल थे। सभी वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जागरूक और ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग के ज़रिए मीडिया लोगों की सोच बदल सकता है और इंसानों तथा वन्यजीवों के बीच बेहतर संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
सम्मेलन में इस बारे में बात हुई कि डर और सनसनी फैलाने वाली खबरों के बजाय ऐसी खबरें कैसे बनाई जाएं जो जागरूकता, सहानुभूति और सह-अस्तित्व को बढ़ावा दें। वर्कशॉप में यह भी बताया गया कि जलवायु परिवर्तन और जंगलों के टुकड़े होने के कारण वन्यजीव इंसानों की बस्तियों के करीब आ रहे हैं, जिससे मध्य प्रदेश में मानव-वन्यजीव टकराव की संख्या और गंभीरता बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और शहरीकरण के कारण देश के पारिस्थितिक परिदृश्य में बदलाव आ रहा है, जिससे मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो अक्सर दुखद परिणाम देती हैं और भय व बदले में किये गये नुकसान का कारण बनती हैं। मध्य प्रदेश, जहां 2022 की गणना के अनुसार 785 से अधिक बाघ और कई संरक्षित वन हैं, भारत के सबसे जैव-विविधता वाले राज्यों में से एक है। बांधवगढ़ नेशनल पार्क जैसे संरक्षण हॉटस्पॉट्स के निकट होने और मानव-वन्यजीव के बीच टकराव के बढ़ते मामलों के कारण यह ऐसे संवादों के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए, वर्कशॉप का मकसद ऐसी खबरों को बढ़ावा देना था जो सटीक, संतुलित और समाधान-केंद्रित हों, सनसनीखेज खबरों के बजाय रचनात्मक और जनता के हित में बातचीत पर ध्यान दें।
संरक्षण नीति के दृष्टिकोण से, मीरा भट्ट, डायरेक्टर, इक्विटेबल कंजर्वेशन, द नेचर कंजर्वेंसी ने घटनाओं को एक बड़े पर्यावरणीय पैटर्न में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि "एक तेंदुए के दिखने की खबर तो सुर्खियां बटोर सकती है, लेकिन अगर हम इन मुठभेड़ों या हमलों के पीछे की पारिस्थितिक गड़बड़ियों या जमीन का इस्तेमाल करने से होने वाले बदलावों पर ध्यान नहीं देते, तो हम असल कहानी से चूक जाते हैं।"
सिस्टम-स्तरीय नजरिये को जोड़ते हुए, अमृता नीलकांतन, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज, एनसीसीआई ने कहा, "इंसानों और जानवरों का एक साथ रहना यानी सह-अस्तित्व केवल एक संरक्षण लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह एक विकासात्मक जरूरत है। मीडिया के पास जनता की सोच को बदलने और नीतियों को आकार देने की शक्ति है। वे कहानी को कैसे प्रस्तुत करते हैं, यह तय करता है कि समुदाय वन्यजीवों से डरते हैं या उनका सम्मान करते हैं।"
मानव-वन्यजीव टकराव पर जिम्मेदार मीडिया कवरेज के दिशानिर्देश: विशेषज्ञों से परामर्श कर तथ्यों की जांच करें: सटीक रिपोर्टिंग के लिए वन्यजीव विशेषज्ञों, संरक्षणवादियों और स्थानीय अधिकारियों से परामर्श कर इन टकराव के कारणों और शामिल प्रजातियों को वेरिफाई करें। सनसनीखेज खबरों से बचें: नाटकीय सुर्खियां ध्यान खींच सकती हैं, लेकिन उससे डर बढ़ता है और वन्यजीवों के खिलाफ बदले की कार्रवाइ भड़क सकती है। संतुलित और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग जरूरी है। वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग: वन्यजीव के व्यवहार के बारे में गलत धारणाओं को फैलने से रोकने के लिए वैज्ञानिक रूप से सटीक भाषा का उपयोग करें। समाधानों पर ध्यान दें: कवरेज में केवल संघर्ष ही नहीं, बल्कि समुदाय की भागीदारी, संरक्षण प्रयासों और सरकार की पहलों जैसे समाधानों पर भी ध्यान देना चाहिए। अलग-अलग दृष्टिकोण शामिल करें: वन्यजीव विशेषज्ञों, संरक्षणवादियों, स्थानीय समुदायों और अधिकारियों की आवाजों को शामिल कर व्यापक समझ प्रदान करें। इससे मुद्दे को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि मीडिया संरक्षण और जन जागरूकता के बीच की दूरी को कम करने में कितनी ताकत रखता है। मध्य भारत में मानव-वन्यजीव टकराव बढ़ने के साथ, दसरा मीडिया और संरक्षणवादियों के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए मंच बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह के संवादों से ऐसी खबरें बनाने की उम्मीद है जो न सिर्फ सटीक हों, बल्कि लोगों की सोच को बेहतर बनाने और लंबे समय तक चलने वाली नीतियों को प्रभावित करने में भी असरदार हों।