
मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग एजुकेशन की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही। सात साल पहले 2018-19 में हालात इतने खराब थे कि 61,814 सीटों में से सिर्फ 29,140 पर ही दाखिले हुए थे। यानी केवल 47% सीटें भरीं। उस दौर में कई कॉलेज बंद हुए और कुछ को अपने कोर्स तक घटाने पड़े। लेकिन, अब तस्वीर बदल चुकी है। तकनीकी शिक्षा संचालनालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2025-26 में 74,722 सीटों पर 44,799 दाखिले हो चुके हैं। यह 60% के करीब है। सीएलसी काउंसलिंग अभी बाकी है। यानी, यह आंकड़ा और बढ़ेगा।
इंजीनियरिंग की सीटें बढ़ने की वजह भी है। दरअसल, आज के दौर में इंजीनियरिंग छात्रों के लिए आज सबसे ज्यादा मल्टीडायमेंशनल जॉब्स उपलब्ध हैं। खासकर कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग से जुड़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी, रोबोटिक्स और डेटा साइंस जैसे नए क्षेत्रों में तेजी से नौकरियां बढ़ी हैं।
अब कंपनियां यह नहीं देखतीं कि छात्र किस ब्रांच से है। यदि किसी ने मैकेनिकल या सिविल जैसी पारंपरिक ब्रांच से पढ़ाई की है, लेकिन साथ ही इमर्जिंग टेक्नोलॉजी में स्किल हासिल की है, तो उसे भी समान अवसर मिल रहे हैं।
सिर्फ प्राइवेट सेक्टर ही नहीं, बल्कि सरकारी संस्थानों में भी इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स की मांग लगातार बढ़ी है। रेलवे, डिफेंस, पब्लिक सेक्टर यूनिट्स और इंजीनियरिंग एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेस जैसे विकल्प युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। इसके अलावा, यूजीसी की ड्यूल डिग्री व्यवस्था भी एक बड़ा कारण है।
अब छात्र बीटेक के साथ-साथ डिस्टेंस मोड से आर्ट्स या अन्य परंपरागत कोर्स भी कर सकते हैं। इससे वे एक साथ प्रोफेशनल और नॉन-प्रोफेशनल विकल्पों के लिए तैयार हो जाते हैं।