
भोपाल : इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल द्वारा नई दिल्ली के लाल किले में आयोजित ‘इंडिया आर्ट आर्किटेक्चर एंड डिज़ाइन बियनाले’ में भारत की समृद्ध जनजातीय एवं लोक कला संस्कृति को देशज प्रदर्शनी के माध्यम से प्रदर्शित किया है। इस बिनाले का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया उन्होंने इस सफल शुरुआत के लिए संस्कृति मंत्रालय, उसके सभी अधिकारी, इसमें प्रतिभागिता कर रहे सभी देशों को, बधाई देते हुए कहा की हर राष्ट्र के पास उसके अपने प्रतीक होते हैं, जो विश्व को उसके अतीत से और उसके मूल्यों से परिचित करवाते हैं। और, इन प्रतीकों को गढ़ने का काम राष्ट्र की कला, संस्कृति और वास्तु का होता है। इन कार्यक्रमों के जरिए हमारा प्रयास है, कि भारत में ग्लोबल कल्चरल इनिशिएटिव को संस्थागत बनाया जाए,उन्होंने इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ही आत्मनिर्भर भारत सेंटर फॉर डिज़ाइन’ का लोकार्पण भी किया । ये सेंटर भारत की यूनिक एवं , दुर्लभ कलाओं को, आगे बढ़ाने के लिए मंच देते हुए कारीगरों और डिज़ाइनर्स को साथ लाने, मार्केट के हिसाब से उन्हें इनोवेशन करने में मदद करेगा। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, अहमदाबाद और वाराणसी में बनने वाले ये कल्चरल स्पेस, इन शहरों को सांस्कृतिक रूप से और समृद्ध करेंगे। ये सेंटर, लोकल आर्ट को बढावा देंगे अगले 7 दिनों के लिए 7 महत्वपूर्ण थीम्स भी तय की हैं इसमें 1: प्रवेश मार्ग का अनुष्ठान: भारत के दरवाजे 2: बाग ए बहार: ब्रह्मांड के रूप में उद्यान: भारत के उद्यान 3: सम्प्रवह: समुदायों का संगम: भारत की बावली 4: स्थापत्य: एंटी फ्रैजाइल एल्गोरिथम: भारत के मंदिर 5: विस्मया: क्रिएटिव क्रॉसओवर: स्वतंत्र भारत के वास्तुशिल्प चमत्कार 6: देशज भारत डिज़ाइन: स्वदेशी डिज़ाइन 7: समत्व: निर्मित को आकार देना: वास्तुकला में महिलाओं का उत्सव मनाना ‘देशज भारत डिज़ाइन’ और ‘समत्व’, इन थीम्स को हमें एक मिशन के रूप में आगे लेकर चलना होगा। देशज डिज़ाइन को बढावा देने के लिए ये जरूरी है कि हमारे युवाओं के लिए अध्ययन और रिसर्च का हिस्सा बने। समत्व थीम वास्तु के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को सेलिब्रेट करती है। मुझे विश्वास है, नारीशक्ति की कल्पनाशक्ति, उनकी रचनात्मकता इस क्षेत्र को नई ऊंचाई पर लेकर जाएगी।
उन्होंने आगे कहा की मनुष्य और दूसरे जीव जंतुओं में साहित्य, संगीत और कला का ही मुख्य अंतर है। यानी, सोने-जागने और पेट भरने की आदतें अपनी स्वाभाविक होती हैं। लेकिन, ये कला, साहित्य और संगीत ही हैं जो मनुष्य के जीवन में रस घोलते हैं, हमारे यहां पशुओं के आभूषण घोड़े पर, अपना डॉग रखते थे उस पर, बैल होते थे, गाय होती थी। उस पर जो आभूषण में जो विविधताएं थी, कला थी यानि ये अपने आप अजूबा है। और कितना परफेक्शन था कि उस पशु को फिजिकली तकलीफ ना हो, इसकी पूरी केयर करके बनाया जाता था। यानि अगर इन चीजों को समाहित करके देखें तब पता चलता है कि कितना सामर्थ्य इसमें भरा हुआ है। आर्ट आर्किटेक्चर और डिजाईन बिनाले के आयोजन इस दिशा में एक अहम शुरुआत साबित होगा।
इस दौरान संग्रहालय के निदेशक प्रोफ़ेसर अमिताभ पांडे ने दर्शको के जिज्ञासा को शांत करते हुए बताया की मध्यप्रदेश के मण्डल जिले की प्रसिद्ध जनजातियों में से एक 'गोंड' द्वारा बानायी गयी चित्र कला की विशिष्ट कला शैली को गोंड चित्रकला के नाम से जाना जाता है। लम्बाई और चौड़ाई केवल इन दो आयामों वाली ये कलाकृतियाँ खुले हाथ बनायी जाती हैं जो इनका जीवन दर्शन प्रदर्शित करती हैं। गहराई, जो किसी भी चित्र का तीसरा आयाम मानी गयी है, हर लोककला शैली की तरह इसमें भी सदा लुप्त रहती है जो लोक कलाओं के कलाकारों की सादगी और सरलता की परिचायक है।
गोंड कलाकृतियाँ इस जनजाति के स्वभाव और रहन सहन की खुली किताब हैं। इनसे गोंड प्रजाति के रहन सहन और स्वभाव का अच्छा परिचय मिलता है। कभी तो ये कलाकृतियाँ यह बताती हैं कि कलाकारों की कल्पना कितनी रंगीन हो सकती है और कभी यह कि प्रकृति के सबसे फीके चित्रों को भी ये अपने रंगों से कितना जीवंत बना सकते हैं।