महाकाल की सवारी में इस्लामिक शब्द- 'शाही' के प्रयोग पर आपत्ति

Updated on 02-09-2024 01:55 PM

उज्जैन महाकाल की नगरी उज्जैन इन दिनों आक्रोश में है। यह आक्रोश सड़कों पर फूटने वाला नहीं बल्कि विद्वानों के विमर्श में आकर व्यवस्था बदलने वाला है। इसका कारण है उज्जैन के राजा और ब्रह्मांड के अधिपति महाकाल की सवारी को 'शाही सवारी' कहना। विद्वानों, संस्कृतज्ञों, अखाड़ों के साधुओं व सनातन धर्मावलंबियों का मत है कि 'शाही' शब्द में इस्लामिक आक्रांताओं और राजशाही की बू आती है।अत: महाकाल की सवारी को 'शाही सवारी' न कहा जाए। इसके स्थान पर संस्कृत या हिंदी का कोई उपयुक्त शब्द प्रचलन में लाया जाए। विद्वतजन यह भी कहते हैं कि इस बदलाव के लिए स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को बीड़ा उठाना होगा, तभी सरकार के दस्तावेजों से लेकर आम जनजीवन तक में 'शाही' शब्द हट सकेगा।

बता दें कि इस बार सावन-भादौ की अंतिम सवारी आज (सोमवार, 2 सितंबर) को निकलने वाली है। यह इस वर्ष की महाकाल की अंतिम व भव्यातिभव्य सवारी होगी, जिसे देखने देशभर से हजारों श्रद्धालु पहुंचेंगे। इसी अंतिम सवारी के पहले इसे 'शाही' कहे जाने को लेकर विद्वानों का यह आक्रोश फूट पड़ा है।

आखिर क्यों है आक्रोश

प्रतिवर्ष श्रावण-भादौ मास के प्रत्येक सोमवार को महाकाल की सवारी निकलती है। इसमें महाकाल पालकी में सवार हो प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं। महाकाल की अंतिम सवारी सबसे भव्य होती है, इसलिए इसे ‘शाही सवारी’ कहा जाता रहा है। किंतु इसे ‘शाही’ कहने पर उज्जैन के संतों, विद्वानों और अखाड़ों के साधुओं में असहमति व आक्रोश है।

इनका कहना है कि जिस महाकालेश्वर मंदिर पर वर्ष 1234 में क्रूर इस्लामिक शासक इल्तुतमिश ने हमला किया और कत्लेआम मचाया, उसी इस्लाम मत के शब्द ‘शाही’ को महाकाल की सवारी से जोड़ना गलत है। अत: इसे अविलंब हटाकर संस्कृत या हिंदी का ऐसा शब्द जोड़ा जाए, जो सवारी की पवित्रता व भव्यता को सही अर्थों में व्यक्त कर सके।

यूं बोले विद्वान

कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन के निदेशक डॉ. गोविंद गंधे कहते हैं- महाकाल की सवारी को शाही कहना उनका अपमान है। शाह तो मुगलों, यवनों का शब्द है। पराधीनता के प्रभाव में यह प्रचलन में आ गया होगा। फिर लोक ने इसे मान्यता दे दी तो शास्त्रों ने भी हस्तक्षेप नहीं किया, किंतु अब इसे हटाना होगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय उज्जैन के पूर्व कुलपति डा. मोहन गुप्त कहते हैं- शाही शब्द सामंती परंपरा का प्रतीक है। महाकालेश्वर कोई शाह या सामंत नहीं बल्कि भगवान हैं। अत: शाही शब्द हटे।

ऋषि संस्कृति गुरुकुल के परमाचार्य डॉ. देवकरण शर्मा कहते हैं- शाही शब्द सवारी के साथ दबाव-प्रभाव के चलते जुड़ा होगा, जो अन्यमनस्कता के चलते लोक-प्रचलन में आ गया। इस्लामिक गंध लिए इस शब्द को अविलंब हटाना चाहिए। शाही अर्थात शासक, जबकि महाकाल तो अनादि-अनंता देव हैं।



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