शिवराज बोले-इतने डंडे मारे कि आज भी दर्द होता है...:आपातकाल का दर्द बयां किया

Updated on 27-06-2024 12:10 PM

'मुझे चार तमाचे मारे। थाने में बंद कर दिया। घुटनों और कोहनी के जोड़ों में इतने डंडे मारे कि आज भी जब बादल छाते हैं तो दर्द होता है। उस समय मुझे रात भर जगा के रखा।'

ये कहना है केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का। वे 1975 में देश में लगे आपातकाल के दौरान का अपना दर्द बयां कर रहे थे। शिवराज सिंह की तरह उस दौर के कई ऐसे नेता और अन्य लोग हैं, जिन्होंने इमरजेंसी की पीड़ा भोगी।

दरअसल, बुधवार को भोपाल में सीएम हाउस में करीब डेढ़ हजार से ज्यादा लोकतंत्र सेनानी (मीसाबंदी - आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले) और उनके परिजन जुटे। CM डॉ. मोहन यादव ने फूल बरसाकर उनका स्वागत किया। उन्हें लेकर कई घोषणाएं भी कीं। इस दौरान लोकतंत्र सेनानियों ने जब इमरजेंसी के दर्द को बयां किया तो वे भावुक भी हो गए।

सबसे पहले केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह की सुनिए..

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान भोपाल में सीएम हाउस में आयोजित मीसाबंदी सम्मेलन में शामिल नहीं हुए, लेकिन दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय संवाद कार्यक्रम में 'इमरजेंसी: आजाद भारत का सबसे काला अध्याय' विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा- जेपी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था कि सिंहासन खाली करो, लेकिन इन्होंने कहा कि किसी कीमत पर कुर्सी नहीं छोड़ेंगे। मौलिक अधिकारों का हनन किया गया। मीसा को खतरनाक बना दिया गया।

मेरी 11वीं कक्षा की परीक्षा थी। मैं भोपाल में पढ़ता था। एक बार मैं पढ़ रहा था तो 11 बजे रात में पुलिस वाले आए। बोले- तू इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन चलाएगा? मैंने कहा कि आंदोलन मैं कहां चलाऊंगा। तभी एक हेड कॉन्स्टेबल ने तलाशी ली तो सामग्री निकली। मुझे चार तमाचे पड़े और हबीबगंज थाने लाकर बंद कर दिया। मेरे घुटनों और कोहनी के जोड़ों में इतने डंडे मारे कि आज भी बादलों के समय में वो दुखते हैं।

शिवराज ने कहा- दूसरे दिन छुट्टी थी तो न्यायाधीश के घर ले गए, उसके बाद मुझे पैदल ले जाने लगे। तांगा निकल रहा था, उसमें सवार लोग मुझे चोर समझने लगे तो मैंने नारा लगाया कि जुल्म के आगे नहीं झुकेंगे, जुल्म किया तो और लड़ेंगे। बैरक में हम रहते थे, एक साथी बीमार हुए, अस्पताल नहीं ले जाया गया और उनकी मौत जेल में हो गई। एक प्रभुदयाल ढोलकिया को पकड़ना था, तो किसी और प्रभुदयाल को ले आए। कुछ दिन बाद एक और प्रभुदयाल को ले आए, कोई सुनवाई नहीं, कोई वकील नहीं।

विधायक अजय विश्नोई बोले- काला पानी जैसी सजा मिली

जबलपुर के पाटन से विधायक और पूर्व मंत्री अजय विश्नोई कहते हैं- '26 जून वो दिन है, जब 49 साल पहले सुबह मेरी जेल में हुई थी। 25 जून की रात में ही मैं अरेस्ट हो गया था। तब मेरी उम्र 21 साल थी। छात्र नेता था। मैंने वाइस चांसलर के खिलाफ आंदोलन किए थे। जयप्रकाश जी के आंदोलन में शामिल था। इससे लाइमलाइट में था, और मुझे गिरफ्तार कर लिया था।

विश्नोई ने कहा- जेल में डाले जाने की खबर मिलते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मैं 5 भाई-बहनों में सबसे बड़ा था। पिताजी की रेलवे में छोटी नौकरी थी। टीकमगढ़ जेल में भेज दिया। ऐसा लगता था कि काला पानी की सजा दे दी। मां से 6 महीने बाद मिला था। वे मुझसे मिलते ही रो पड़ी। उन दिनों की यादें कई सबक देती है। इमरजेंसी के दौरान टीकमगढ़, जबलपुर और जावरा जेल में बंद रहा।'

'पता था गिरफ्तार करेंगे, इसलिए कपड़ों का बैग तैयार रखा था'
मंदसौर के पिपलिया मंडी के मनोहरलाल जैन ने बताया, इमरजेंसी का दर्द कैसे कहूं... परिजनों की जिंदगी बर्बाद हो गई। बात जुलाई 1975 की है। इमरजेंसी का एक महीना बीता था। मैं घर पर सो रहा था। देर रात पुलिस आई और कहा कि कलेक्टर साहब बुला रहे हैं। मुझे पहले ही पता था कि मेरी कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है। इसलिए मैंने कपड़ों का बैग पहले से ही तैयार कर रखा था। रास्ते में मैंने दस्त लगने की बात कही और पीछे आ रहे भाई के साथ चला गया, लेकिन पुलिस पीछे-पीछे आ गई और अगले दिन मंदसौर ले आए।

तब मैं को-ऑपरेटिव बैंक का सदस्य था। सुंदरलाल पटवा भी संचालक मंडल में थे। जिन्हें पहले ही बंद कर दिया था। मुझे मिलाकर 13 सदस्यों को जेल में एक साथ बंद किया। जेल में कैदियों को एक-दूसरे से लड़वाया गया। मुझे माफी मंगवाने के लिए प्रताड़नाएं दी गईं। 11 महीने तक पैरोल भी नहीं मिला। परिजनों को भी तरह-तरह की प्रताड़ना दी गई। कुछ को नीमच जेल में बंद भी किया। मैं 18 महीने तक जेल में बंद रहा। तब 35 साल की उम्र थी।

जेल में जली रोटियां और पानी वाली दाल ही मिलती थी
लोकतंत्र सेनानी संघ जबलपुर के अध्यक्ष अंजनी कुमार सिंह ने बताया, 2 जुलाई 1975 को पुलिस ने जबलपुर के 365 लोगों को पकड़ा था। जबलपुर की सुभाषचंद्र बोस जेल में ले जाकर बंद कर दिया। यहां इतनी प्रताड़ना मिली कि उन्हें बयां करना मुश्किल हैं। खाने में जली रोटियां और पानी वाली दाल ही मिलती थी। एक-दूसरे से बात नहीं कर सकते थे। राजनीतिक बंदियों को ज्यादा प्रताड़ना दी गई। पुलिस वालों से बात करते तो वे कहते थे कि हमें आगे से आदेश मिले हैं।

परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा
जबलपुर के डॉ. रविंद्र कुमार बताते हैं, प्रताड़ना हमसे ज्यादा घरवालों को मिली, क्योंकि मेरे साथ पिता शिवप्रसाद जी को भी जेल में बंद कर दिया था। इससे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनसे दिन में कोई मिलने भी नहीं आता था। रात में चोरी-छिपे रिश्तेदार मिल पाते थे। मैं 1 महीने और पिता जी 19 महीने तक जेल में बंद रहे।

पिता जेल गए, लेकिन सजा पूरे परिवार ने भुगती
शाजापुर नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप चंद्रवंशी कहते हैं- पिता रामचंद्रजी खाती 19 महीने तक राजगढ़ जेल में बंद रहे थे। पुलिस ने उन्हें जेल में भेजा, लेकिन सजा पूरे परिवार ने भुगती। घर में मातम सा छा गया। तब मेरी उम्र 5 साल थी। दादा-दादी, मां और काका (अंकल) ने मुझे और छोटी बहन को संभाला। जब उन्हें पुलिस लेकर गई तब वे मेहमानों के साथ थे। पिताजी जब जेल से बाहर आए, तब पूरा परिवार बिखर चुका था। पिताजी जनसंघ, आरएसएस से जुड़े थे। इस कारण उन्हें जेल में रखा था। आने के बाद उन्होंने पूरा दर्द बयां किया था।

पति-ससुर दोनों जेल में बंद, एक समय खाना खाकर गुजारा किया
भोपाल के जेके रोड निवासी 81 वर्षीय सुशीला पालीवाल इमरजेंसी का दर्द बताते हुए भावुक हो गईं। पिता नरेंद्र कुमार पालीवाल और ससुर बृजेंद्र कुमार पालीवाल भोपाल जेल में 19 महीने तक बंद रहे। पति-ससुर के जेल में बंद होने से कई प्रताड़नाएं झेली।

पुलिसवाले घर के बाहर पहरा देते थे। परिजन या रिश्तेदार आ नहीं सकते थे, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उन्हें भी पुलिस गिरफ्तार कर जेल में बंद न कर दें। बच्चों के पालन पोषण में दिक्कतें हुईं। बच्चों के साथ एक समय ही खाना खाकर गुजारा किया। उनकी पढ़ाई भी खत्म हो गई।



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