भोपाल : इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के नवीन श्रृंखला सप्ताह का प्रादर्श के अंतर्गत आज अप्रैल माह के द्वितीय सप्ताह के प्रादर्श के रूप में लेलू/सारा/रादुम/राडी, पुरुषों द्वारा धारण किया जाने वाला एक हैवरसैक को अरुणाचल प्रदेश की जनजातीय समुदाय से संग्रहालय द्वारा सन 1986 में संकलित किया गया है। इस प्रादर्श को इस सप्ताह दर्शकों के मध्य प्रदर्शित किया गया।
इस सम्बन्ध में संग्रहालय के निदेशक डॉ भुवन विक्रम ने बताया कि महान पूर्वज अबोतानी की वंशज अपातानी न्यिशी आदि गालो और तागिन जनजातियाँ स्वयं को तानी समूह का मानती हैं।अरुणाचल प्रदेश की इन जनजातियों में ग्राम प्रधानों पुजारियों और योद्धाओं को उनकी व्यक्तिगत सज्जा के रूप में प्रयुक्त विशिष्ट पोशाक के माध्यम से पहचाना जाता है। पीठ पर ढाल की तरह धारण किए जाने वाले इस पारंपरिक पहनावे को आदि और गालो जनजाति में लेलू सारा रेडम या राडी जैसे विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। गालो जनजाति में इसे पुरुषों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।विवाह समारोह के दौरान यह वधु के घर पर वर के कजिन माक बोलुक और करीबी रिश्तेदारों द्वारा पहना जाता है। मुख्य रूप से बेंत से बनी यह आकर्षक कलाकृति भालू के खाल जैसी प्रतीत होने वाली जंगली घास से ढकी जाती है। प्राचीन समय में योद्धा अपनी सामाजिक प्रस्थिति के प्रतीक स्वरूप एवं सज्जा के लिए अपनी पीठ पर भालू की खाल धारण करते थे। परंतु इस प्रादर्श में भालू के खाल के स्थान पर वैसी ही दिखने वाली जंगली घास का उपयोग किया गया है। इसके अलावा नोकते और वांचो जनजातियां भी इसका इस्तेमाल अपने पारंपरिक शिरोवस्त्र को सजाने के लिए करती हैं। प्राचीन समय में जनजातियों के आपसी झगड़ों के दौरान होने वाले संगठित युद्ध में यह योद्धाओं के लिए ढाल के रूप में काम करता था। इसके अलावा सामान्यतः एक पुरुष कठिन चढ़ाई वाले दुर्जेय जंगलों में शिकार अभियानों और लंबी यात्राओं के दौरान पीछे से खतरनाक जानवरों के हमलों से रक्षा एवं कांटेदार वनस्पतियों से बचाव हेतु इसे धारण करता है।