आदिवासी आर्टिस्ट ने मजदूरी कर 7 लाख रुपए इकट्‌ठा किए, लोक कलाकारों से मिल रहा काम

Updated on 23-02-2023 06:20 PM

रिकॉर्डिंग स्टूडियो का नाम सुनकर साउंड प्रूफ एसी रूम और महंगा सेट की छवि मन में उभरती है, लेकिन आदिवासी आर्टिस्ट में झोपड़ी में ही रिकॉर्डिंग स्टूडियो बना डाला। यह स्टूडियो अत्याधुनिक इक्विप्मेंट्स से लैस है। इसे तंबूरा स्टूडियो नाम दिया है। आदिवासी आर्टिस्ट ने 8 साल तक मजदूरी कर इकट्‌ठा किए 7 लाख रुपए से इसे बनाया है। इसे बनाया है रतलाम के कांगसी गांव के रहने वाले आर्टिस्ट दीपक चरपोटा ने। दीपक को प्रसिद्ध लाेक कलाकारों से रिकॉर्डिंग के ऑर्डर भी मिलने लगे हैं।

रतलाम का कांगसी गांव। यहां रहता है दीपक चरपोटा। दीपक आदिवासी आर्टिस्ट है। परिवार में माता-पिता और चार भाई-बहन हैं। पिता कि गांव में ही दो बीघा जमीन है, जो परिवार को पालने के लिए नाकाफी है। ऐसे में परिवार मजदूरी करने आसपास के जिले और दूसरे प्रदेशों में भी जाया करता है। युवा गायक ने मजदूरी करके धीरे-धीरे म्यूजिक इक्विप्मेंट खरीदे। अपने सपनों का म्यूजिक स्टूडियो बनाया है, जिसका नाम रखा तंबूरा स्टूडियो। बड़े स्टूडियो में रिकॉर्डिंग का खर्च बहुत ज्यादा होता है। यही सोच कर दीपक ने अपने घर को ही म्यूजिक स्टूडियो बना डाला।

तंबूरा स्टूडियो की कहानी

दरअसल, रतलाम के फिल्मकार और संगीतकार हरीश दर्शन शर्मा आदिवासी अंचल में वीडियो शूट करने कांगसी गांव पहुंचे थे। यहां एक कच्चे-पक्के झोपड़ी नुमा मकान में कबीर के भजनों और म्यूजिक की आवाज सुनाई दी। इसके बारे में जानकारी ली, तो दीपक चरपोटा से मुलाकात हुई। दीपक उन्हें घर के अंदर ले गया, तो आधुनिक रिकॉर्डिंग स्टूडियो देखकर वह दंग रह गए। इसके बाद दीपक के संघर्ष और रिकॉर्डिंग स्टूडियो बना लेने की कहानी सामने आई।

दीपक के पिता भी गांव में भजन कीर्तन शामिल होते रहे हैं। इससे दीपक की संगीत के प्रति रुचि बढ़ने लगी। इसके बाद दीपक चरपोटा ने पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया को गुरु बना लिया। उनके सानिध्य में संगीत की प्रस्तुतियां भी दीं। इसी दौरान दीपक को संगीत की ऐसी लगन लगी कि उसने अपने झोपड़े को ही म्यूजिक स्टूडियो बना दिया। पैसे नहीं थे, तो आसपास के प्रदेशों में जाकर उसने मजदूरी कर 8 साल में मजदूरी कर पैसे इकट्ठे किए। इसके बाद घर को रिकॉर्डिंग स्टूडियो बना डाला।

8 साल से एक ही लगन, मजदूरी कर इकट्ठा किए रुपए

दीपक की यह कहानी न केवल संघर्ष, बल्कि संयम और लक्ष्य के प्रति जुनून को भी दर्शाती है। दीपक खुद के म्यूजिक वीडियो एलबम और कबीरपंथी भजनों की रिकॉर्डिंग करना चाहता था, लेकिन बड़े शहर में जाकर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में रिकॉर्डिंग करने की कीमत के बारे में जब उसने जानकारी ली, तो निराशा हुई। दीपक ने फैसला किया कि वह गांव में ही रिकॉर्डिंग स्टूडियो तैयार करेगा। इसके लिए इंटरनेट और यूट्यूब से जानकारी जुटाना शुरू की। रिकॉर्डिंग स्टूडियो के लिए महंगे उपकरण और संसाधनों की आवश्यकता थी। इसके लिए गुजरात और राजस्थान के बड़े शहरों में जाकर मजदूरी भी की। दीपक ने करीब 7 लाख खर्च कर तंबूरा स्टूडियो तैयार किया है।

यूट्यूब और इंटरनेट से लिया तकनीकी ज्ञान

दीपक ने शुरुआती दिनों में शहर जाकर रिकॉर्डिंग स्टूडियो को देखा। वहां किस तरह के उपकरण लगे हैं, कैसे म्यूजिक रिकॉर्डिंग की जाती है। इसके बाद यूट्यूब और इंटरनेट पर सर्च कर म्यूजिक रिकॉर्डिंग स्टूडियो के 1-1 कंपोनेंट के बारे में जानकारी ली। दीपक सभी मुख्य वाद्य यंत्रों को बजाने के साथ गायन भी करता है। वहीं, म्यूजिक कंपोजिंग और एडिटिंग भी दीपक ही कर लेता है। इन सभी विधाओं का अभ्यास दीपक ने एकलव्य की तरह आदिवासी अंचल में यूट्यूब और इंटरनेट पर देख कर किया है।

पहले गांव वाले उड़ाते थे मजाक, अब मशहूर लोक कलाकारों से मिल रहा काम

दीपक बताते हैं कि मजदूरी में जो काम मिल जाता था, वह कर लेता था। मुझे जितने भी रुपए मिलते, उनसे कोई ना कोई उपकरण खरीद लेता। घर के लोगों का तो सहयोग मिलता था, लेकिन गांव के लोग मेरा मजाक उड़ाते थे कि यह क्या पागलपन कर रहा है। मीडिया के माध्यम से जब से तंबूरा स्टूडियो की जानकारी लोगों तक पहुंची है। उसके बाद मशहूर लोक कलाकार कालूराम जी बामनिया से भजन अलबम रिकॉर्डिंग का काम दिया है। ईशान फिल्म प्रोडक्शन के हरीश दर्शन शर्मा ने भी दीपक को वीडियो एल्बम के लिए काम दिया है। वहीं, दीपक का तंबूरा स्टूडियो यूट्यूब चैनल भी तेजी से मशहूर हो रहा है।

लोक कलाकारों को गांव में ही मिले मंच यही तंबूरा स्टूडियो का उद्देश्य

दीपक चरपोटा आमतौर पर संतों की वाणी ही गाते हैं, उन्हें यही गाना अच्छा लगता है। दीपक का कहना है कि ये जीवन जीने कि प्रेरणा देते हैं। संतों की वाणी जीवित रहे और गरीब गायकों को एक मंच मिले यही तंबूरा स्टूडियो को मुख्य उद्देश्य है।


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