मप्र की कुल जनसंख्या की लगभग 20 प्रतिशत आबादी आदिवासी है. जनगणना 2011 के मुताबिक, मध्यप्रदेश में 43 आदिवासी समूह हैं. इनमें भील-भिलाला आदिवासी समूह की जनसंख्या सबसे ज्यादा 59.939 लाख है. इसके बाद गोंड समुदाय का नंबर आता है, जिनकी आबादी 50.931 लाख हैं. इसके बाद कोल (11.666 लाख), कोरकू (6.308 लाख) और सहरिया (6.149 लाख) का नंबर आता है. यूं तो आदिवासी आबादी 20 प्रतिशत हैं, लेकिन सामाजिक और मानव वैज्ञानिक विविधताओं के कारण यह आबादी कभी व्यापक राजनीतिक दबाव समूह की तरह पेश नहीं हुई है.
सवर्ण नेतृत्व का लंबा इतिहास रहा है, जिसे इतिहास ने पर्याप्त पहचान दी है। दलित नेतृत्व का श्रेय बाबा साहेब आंबेडकर की वैचारिक चेतना को दिया जा सकता है, जिसमें संविधान द्वारा प्रदत्त राजनीतिक आरक्षण ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के लोकतांत्रिक नेतृत्व के उभार में खुद का बलबूता या फिर एक हद तक तुष्टीकरण की नीति को कारण माना जा सकता है। पर सवाल है कि अब तक आदिवासी लोकतांत्रिक नेतृत्व अन्य वर्गों की तरह अपेक्षित उभार क्यों नहीं ले सका
किसी भी देश-समाज में उभरने वाली लोकतांत्रिक राजनीति के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक वैचारिकी का निर्माण हो। जब हम दलितों से आदिवासियों के राजनीतिक नेतृत्व की तुलना करते हैं, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि दलितों में मसीहा के रूप में बाबा साहेब आंबेडकर मौजूद हैं, जो संपूर्ण राष्ट्र के दलित समाज के वैचारिक महानायक हैं, जिनसे दलित समाज निरंतर प्रेरणा लेता रहता है।
आंबेडकर ने कहा था कि ‘सत्ता वह मास्टर चाबी है, जिससे किसी भी ताले को खोला और बंद किया जा सकता है।’ दलित राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र में आवश्यक हस्तक्षेप किया है। मगर आदिवासी की राजनीतिक लड़ाई कोई दूसरा लड़ने का दावा कर रहा है, चाहे वह एनजीओ हो, धर्मांतरणकारी या नक्सलवाद के नाम पर हिंसक तत्त्व
इन सारी गतिविधियों का नेतृत्व गैर-आदिवासी करता है, इसीलिए आदिवासी के भले का तरीका भी गलत है और इरादा भी गलत।
सरकारी बजटों में पर्याप्त धनराशि होने के बाद भी आदिवासी समाज विकास की धारा से अब तक नहीं जुड़ पाया है।
स्वस्थ और समृद्ध लोकतंत्र समाज के सभी घटकों के प्रतिनिधित्व की अपेक्षा करता है।
राजनीतिक सत्ता किसी आदिवासी के हाथों में देने का फ़ैसला लेने की हिम्मत विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने वाली मुख्यधारा की कोई पार्टी कर सकती है?
सामाजिक एवं मानवशास्त्रीय अध्ययनों में सिद्ध हुआ है कि मध्यप्रदेश ईसा काल के पहले से आदिवासियों की आश्रय स्थली रहा है. इतनी पुरानी आबादी होने के बाद भी यह समूह प्रदेश के विकास के साथ कदमताल नहीं कर पाया है
आदिवासी इलाकों में भयंकर भूखमरी, कुपोषण, पलायन, बिजली, बेराजगारी, सड़कें और बदतर स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों को उठा रहा है. 5वीं अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को स्वशासन प्रदान करने के लिए संसद में कानून भी बनाया गया, लेकिन इतने सालों के बाद आज तक उसे पूर्ण रुप से लागू नहीं किया गया.
आदिवासी वोट बैंक मूलरूप से कांग्रेस के साथ रहा है. कुछ वर्षों पहले ये भाजपा के पास आया. यही कारण है कि 47 आरक्षित सीटों में से 32 सीटों पर भाजपा और 15 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है. इसके अलावा प्रदेश में 30 सीटें ऐसी हैं जो आदिवासियों के लिए आरक्षित तो नहीं है, लेकिन उन पर आदिवासियों का वोट निर्णायक होता है. प्रदेश में लोकसभा की 29 में से 6 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित है. इनमें से 6 सीटों पर भाजपा काबिज है. 6 के अलावा 4 अन्य सीटों पर आदिवासी वोट प्रतिशत फेरबदल करने में सक्षम है.
समय-समय पर प्रदेश की राजनीति में आदिवासी नेतृत्व तेजी से उभरता है और फिर अचानक गायब हो जाता है.
फिर भी जमुना देवी, दिलीप सिंह भूरिया, कांतिलाल भूरिया, फग्गन सिंह कुलस्ते और अब कुंवर विजय शाह, अंतरसिंह आर्य, ओमप्रकाश धुर्वे, रंजना बघेल, निर्मला भूरिया और नवनिर्वाचित जिला उपाध्यक्ष खंडवा दिव्यादित्य शाह जैसे नेताओं ने आदिवासी राजनीति को धार दी है.
आदिवासी समाज की विरासत में सामूहिकता एक शक्तिशाली तत्त्व रहा है
सभी वर्गों के जागरूक लोगों और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी लोकतांत्रिक नेतृत्व को विकसित किया जाए।
जो विकसित और समृद्ध लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है