2022 नगरीय निकाय चुनाव की सूक्ष्मता वाली स्क्रिप्ट पड़ताल जरूरी, मीठा मीठा ले लो, हार पर मजहम्मत नही जीत का श्रेय खुद के हाथो खुद की पीठ थप थपालो, राज्य नेतृत्व के साथ राष्ट्रीय नेतृत्व को इस खेल को समझना होगा, 2018 की पुनरावृति कब तक..............
नगर निगम चुनावों में वार्डो से गुमशुदा भाजपा का वोट चर्चाओ में सुनाई आ रहा पर रोड पर, (वार्ड) क्रमांक 47,48 के गली मोहल्लों में दिखाई नही दे रहा! गुमशुदा वोटर आखिर किस दल के थे!मुख्य मुकाबले में रहने वाली कांग्रेस का वोट तो बराबर दिखाई दे रहा पर केंद्र और राज्य की सत्ता का सत्ता सुख भोगने वाला वार्ड का मतदाता प्रत्याशीयो ( प्रतिनिधि) से वार्ड क्रमांक 47, 48में कैसे दूर हो सकता है! , हार जीत चुनाव का हिस्सा होता है पर इन दो वार्डो में भाजपा प्रत्याशीयो को मिलने वाले वोट का न मिलना आंतरिक कलह, भितरघात, बड़े नेताओं की पिछले 10, 12साल की जुगलबंदी की और इशारा कर रहा है! हार की स्क्रिप्ट पर सूक्ष्मता का आकलन कर गुमशुदा वोटर की पड़ताल करना जरूरी है क्योंकि पार्टी का वोटर गुमशुदा ! हुआ या गद्दार! आज लिखना संभव नही।
आम जनमानस के बिच जो चर्चा आम है उस पर पर लेखन करते वक्त कलम खुद अपनी उपयोगिता पर प्रश्न कर रही की महान घोडे? पर बाबर कब तक बैठे रहेगा !
देश में भारतीय जनता पार्टी का कमल निशान पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण की और पहुंच गया है, दूसरी और शहर की सत्ता गाँधी चौक में नगरीय निकाय की घोषणा के बाद पहली बार कमल खिला चुकी है , क्या अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के सिद्धांत के बूते कमल खिला? या खड़े होने वाला घोड़ा टांगे से जूता हुआ होने के कारण बाबर सवारी नही कर पाया!
कुल मिलाकर सत्ता के वार्ड एवम शहर के शिरमोर नेता नगरीय निकाय चुनाव में शरीर लेकर वार्ड क्रमांक 47, 48 में पहुंचे तो थे किंतु क्या आस्था विपक्ष की चौखट पर मत्था टेकने रुक गईं थी! जिसके कारण पार्टी का अपना वोट खिसक कर विरोधी के पक्ष में चला गया। क्या इस सच को आम से लेकर खास मतदाता या पार्टी का नेता झुटला सकता है, भाजपा प्रत्याशी की वार्ड में सक्रियता, राजनीतिक -सामाजिक जीवन में व्यस्तता को देखकर कतई इस बात का अंदाजा नही लगा सकते जिस भरतीय जनता पार्टी का मतदाता दूरदराज क्षेत्रों में पहुंच चुका है उसी पार्टी का जनाधार अटल भवन से 5 से 7 किलोमीटर दूर शिवाजी नगर, चिंचाला में पहुंच नही सका। खेर हम इन दो वार्डो पर मिली शिकस्त पर मझम्मत नही कर रहे सिर्फ मंथन इस बात का ठेके की मलाई का लुफ्त उठाने वाले नेताओं को निजी स्वार्थ को छोड़कर पार्टी हित में सोचना शुरू कर देना चाहिए क्योंकि हारने वाला खुद कभी नही हारता, पार्टी हारती है।