मालती राय का टीचर से भोपाल महापौर तक का सफर:बोलीं- 23 साल पहले भी दावेदार थीं

Updated on 09-08-2022 06:43 PM

राजधानी भोपाल की नौवीं महापौर मालती राय की फर्श से अर्श तक पहुंचाने की कहानी दिलचस्प है। 37 साल पहले 175 रुपए की तनख्वाह पर टीचर की नौकरी कर चुकी मालती शहर की प्रथम नागरिक हैं। शादी के बाद दो कमरे के छोटे से मकान में रहीं। पॉलिटिक्स के बीच परिवार की जिम्मेदारी भी निभाई। बीजेपी की छोटी सी कार्यकर्ता से राजनीति शुरू की। 23 साल पहले भी महापौर की दावेदार थीं, पर टिकट नहीं मिला। बावजूद वे मायूस नहीं हुई। पार्टी में लगातार काम करती रहीं। इसका फल उन्हें अब मिला है। मालती राय कहती हैं कि शहर की मेयर और परिवार की जिम्मेदारियां साथ-साथ निभाना चुनौती तो है, लेकिन कठिन नहीं। 

'मेरा राजनीतिक 1984 से सफर शुरू हुआ। पहले मैं बीजेपी की कार्यकर्ता बनी। फिर सदस्य रही। 1998 में महिला मोर्चा की महामंत्री बनी। छह साल बाद वार्ड-26 से पार्षद का चुनाव लड़ा। साल 1999 में महापौर की दावेदारी की, लेकिन पार्टी का आदेश था कि मैं संगठन में काम करूं। मैं भी काम करती रही। वर्ष 2009 में बीजेपी उपाध्यक्ष बनी। 2008 से अब तक नरेला विधानसभा की प्रभारी रही। इसके साथ ही संगठन की अनेक गतिविधियों में शामिल रही। आखिरकार पार्टी ने आशीर्वाद दिया और अब मेयर बनी हूं।

मेयर के रूप में शहर और पत्नी-मां के रूप में घर की जिम्मेदारी निभाना चुनौती से कम नहीं है, लेकिन कठिन भी नहीं। राजनीतिक जीवन में अनेक चुनौतियां सामने आईं, लेकिन मैंने किसी भी काम को चुनौती नहीं माना। परिवार और राजनीति दोनों को समय दिया। मेयर बनने के बाद मैं दोनों में तालमेल बैठा रही हूं और इसमें सफल भी रहूंगी।'

बीना में जन्म, भोपाल की बहू
मालती राय (58) भोपाल की तीसरी महिला और अब तक की नौंवी मेयर हैं। उनका जन्म बीना में हुआ। शुरुआती स्कूली पढ़ाई भी वहीं हुई। वर्ष 1983 में 11वीं पास करने के बाद भोपाल के एमएल राय से विवाह हुआ। दो कमरों के मकान में वे जॉइंट फैमिली में रहती थीं। इस बीच उन्होंने अगले ही साल राजनीति में कदम रखा। कॅरियर की शुरुआत स्कूल में टीचर के रूप में की। 1985 में ब्राइट कॅरियर स्कूल में 175 रुपए की तनख्वाह पर नौकरी की। इसके तीन साल बाद ही वर्ष 1988 में सिर्फ 35 बच्चों के साथ पुष्प विहार स्कूल शुरू किया। इस दौरान उन्होंने बीए, एमए और बीएड किया। वे 2010 में पार्षद का चुनाव हार चुकी हैं, लेकिन इस हार ने उन्हें तोड़ा नहीं। वे कहती हैं कि हार से कई सीख मिलती हैं। मुझे भी बड़ी सीख मिली। इसके साथ ही सफलता मिलती रही।


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