Swaroopanand Saraswati: 9 साल की उम्र में घर छोड़ बने 19 साल की उम्र में क्रांतिकारी साधु

Updated on 12-09-2022 04:51 PM
जब 1942 में देश में अंग्रेज भारत छोड़े का नारा बुलंदियों पर था तब स्वरूपानंद सरस्वती भी देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। उस वक्त उनकी उम्र महज 19 साल थी।

हिंदुओं के सबसे बड़े धर्मगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का निधन होने से उनके शिष्यों में शोक की लहर है। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सितंबर 1924 को मध्य प्रदेश सिवनी जिले में जबलपुर के पास दिघोरी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम धनपति उपाध्याय और माता का नाम गिरिजा देवी था। ब्राह्मण परिवार में जन्में स्वरूपानंद सरस्वती ने कम उम्र में ही धार्मिक यात्राएं शुरू कर दी थी।

बताया जाता है कि 9 साल की उम्र में उन्होंने अपना घर छोड़ा था। इसके बाद वो काशी पहुंचे। काशी में उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा हासिल की। एक बात यह भी है कि महज नौ साल की उम्र में घर छोड़ने वाले स्वरूपानंद सरस्वती 19 साल की उम्र में 'क्रांतिकारी साधु' भी कहे जाने लगे।

दरअसल जब 1942 में देश में अंग्रेज भारत छोड़े का नारा बुलंदियों पर था तब स्वरूपानंद सरस्वती भी देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। उस वक्त उनकी उम्र महज 19 साल थी। उसी वक्त उन्हें क्रांतिकारी साधु भी कहा गया। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय स्वरूपानंद सरस्वती को उन दिनों जेल में भी जाना पड़ा था।

उन्होंने वाराणसी की जेल में नौ और मध्य प्रदेश की जेल में 6 महीने की सजा भी काटी है। वो करपात्री महाराज की राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी थे। सन् 1940 में वे दंडी संन्यासी बनाये गए और 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली। 1950 में शारदा पीठ शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे।

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने झोतेश्वर धाम में अंतिम सांस ली है। 99 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। अंतिम समय में शंकराचार्य के अनुयायी और शिष्य उनके साथ थे। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के भक्त विदेश में भी हैं। बताया जाता है कि करीब 1300 साल पहले आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ने हिंदुओं और धर्म के अनुयायी को संगठित करने और धर्म के उत्थान के लिए पूरे देश में 4 धार्मिक मठ बनाए थे। इन चार मठों में से एक के शंकराचार्य जगतगुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती थे, जिनके पास द्वारका मठ और ज्योतिर मठ दोनों थे।

कई मुद्दों पर रखते थे बेबाकी से राय
शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती अपनी बात बेबाकी से रखने के लिए भी जाने जाते थे। साल 2015 में उन्होंने आमिर खान की फिल्म पीके पर सवाल उठाए थे। उन्होंने मांग की थी कि सीबीआई को इस बात की जांच करनी चाहिए कि आखिर इस फिल्म को सर्टिफिकेट कैसे मिल गया जबकि सेंसर बोर्ड के अधिकांश सदस्यों ने मांग की थी कि इसकी समीक्षा फिर होनी चाहिए।

इसके अलावा शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने की वकालत भी की थी। उन्होंने कहा था कि आर्टिकल 370 हटने से घाटी के लोगों को काफी फायदा होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि कश्मीर घाटी में हिंदुओं के लौटने से राज्य की देश विरोधी ताकतें कमजोर होंगी।

RSS पर कही थी यह बात..
यूनिफॉर्म सिविल लॉ की वकालत करने वाले शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उत्तराखंड में गंगा नदी पर हाइड्रो प्रोजेक्टस का विरोध भी किया था। अहमदनगर में स्थित भगवान शनि के मंदिर शनि शिंगणापुर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ भी थे। इसके अलावा आरएसएस पर दिया गया उनका एक बयान काफी चर्चा में रहा था।

मार्च 2016 में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं का नाम जरूर लेता है, लेकिन हिंदुत्व के प्रति संघ की कोई जिम्मेदारी नहीं है। आरएसएस लोगों को यह कहकर धोखा देता है कि वे हिंदुओं की रक्षा कर रहे हैं। यह अधिक खतरनाक है।


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